Monday, May 4, 2009

बनारस के शायर/मेयार सनेही


मैं इस ब्लाग का शुभारम्भ बनारस के जाने माने मशहूर शायर ज़नाब "मेयार सनेही"जी से कर रहा हूँ। इनका जन्म ०७-०३-१९३६ में हुआ। बनारस के कवि सम्मेलनों, कवि गोष्ठियों और मुशायरों को अपने शेरों से आप एक नई ऊँचाई प्रदान करते हैं । आप की ग़ज़लें,नज़्म विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में समय समय पर छपती आ रही हैं और आप की १९८४ में एक नज़्म की पुस्तक "वतन के नाम पाँच फ़ूल" भी प्रकाशित हो चुकी है। लगभग ४० सालों से आप साहित्य सर्जना में लगे हैं और ये क्रम अभी जारी है।
निवास-एस.७/९बी,गोलघर कचहरी,वाराणसी।
सम्पर्कसूत्र-९९३५५२८६८३



तो लीजीए उनकी ग़ज़लों का आनन्द........

1. ग़ज़ल/ कैसे वो पह्चाने ग़म :-

कैसे वो पह्चाने ग़म ।
पत्थर है क्या जाने ग़म।


दुनिया मे जो आता है,
आता है अपनाने ग़म।

नये गीत लिखवाने को,
आये किसी बहाने ग़म।

जब तक मेरी साँस चली,
बैठे रहे सिरहाने ग़म।

मैनें सोचा था कुछ और,
ले आये मयख़ाने ग़म।

जिसको अपना होश नहीं,
उसको क्या गरदाने ग़म।

दिल सबका बहलाते हैं,
जैसे हों अफ़साने ग़म।

क्या कहिये ’मेयार’ उसे,
जो खुशियों को माने ग़म।

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2. ग़ज़ल/ मोहब्बत की नुमाइश चल रही है :-

मोहब्बत की नुमाइश चल रही है।
मगर परदे में साजिश चल रही है।


वो बातें जिनसे मैं जख़्मी हुआ था,
अब उन बातों में पालिश चल रही है।

वो इक सजदा जो मुझसे हो न पाया,
उसी को लेके रंजिश चल रही है।

वो देखो जिन्दगी ठहरी हुई है,
मगर जीने की ख़्वाहिश चल रही है।

कोई ’मेयार’ होगा जिसकी खातिर,
सिफ़ारिश पर सिफ़ारिश चल रही है।

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3.ग़ज़ल/मेयार सनेही/कौन बे-ऐब है पारसा कौन है :-

कौन बे-ऐब है पारसा कौन है ?
किसको पूजे यहाँ देवता कौन है ?


जब चलन में है दोनों तो क्या पूछना,
कौन खोटा है इनमें खरा कौन है ?

ज़हर देता रहे औ’ मसीहा लगे,
आप जैसा यहाँ दूसरा कौन है?

रूप है इल्म है सौ हुनर हैं मगर,
ऐसी चीजों को अब पूछता कौन है?

अन्न उपजाने वाला मरा भूख से,
इस मुक़द्दर का आख़िर ख़ुदा कौन है ?

कौन ’मेयार’है यह नहीं है सवाल,
ये बताएँ कि वो आपका कौन है ?

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4. ग़ज़ल/ हसीं भी है मोहब्बत की अदाकारी :-

हसीं भी है मोहब्बत की अदाकारी भी रखता है।
मगर उससे कोई पूछे वफ़ादारी भी रखता है ।


इलाजे-जख़्मे-दिल की वो तलबगारी भी रखता है,
नये जख़्मों की लेकिन पूरी तैयारी भी रखता है।

इक ऐसा शख्स मेरी ज़िन्दगी में हो गया दाख़िल,
जो मुझको चाहता है मुझसे बेज़ारी भी रखता है।

वो मत्था टेकता है गिड़गिड़ाता है कि कुछ दे दो,
फ़िर उसके बाद ये दावा कि खुद्दारी भी रखता है।

वही है आजकल का बागबाँ जो हाथ में अपने,
दरख़्तों की कटाई के लिये आरी भी रखता है।

ख़ुदा के नाम पर भी तुम उसे बहका नहीं सकते,
वो दीवाना सही लेकिन समझदारी भी रखता है।

तुम उसके नर्म लहजे पर न जाओ ऐ जहाँ वालों,
वो है ’मेयार’ जो लफ़्जों में चिनगारी भी रखता है।
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मेयार सनेही जी ने नये-नये रदीफ़ और काफ़िया को लेकर कई ग़ज़लें कही हैं जैसे इस ग़ज़ल में.........

5. ग़ज़ल/ इक गीत लिखने बैठा था :-

इक गीत लिखने बैठा था मैं कल पलाश का।
ये बात सुन के हँस पडा़ जंगल पलाश का ।


साखू को बे-लिबास जो देखा तो शर्म से,
धरती ने सर पे रख लिया आँचल पलाश का।

रितुराज के ख़याल में गुम होके वन-परी,
कब से बिछाये बैठी है मख़मल पलाश का।

सूरज को भी चराग़ दिखने लगा है अब,
बढ़ता ही जा रहा है मनोबल पलाश का।

रंगे-हयात है कि है मौसम का ये लहू,
या फ़िर किसी ने दिल किया घायल पलाश का।

तनहा सफ़र था राह के मंजर भी थे उदास,
अच्छा हुआ कि मिल गया संबल पलाश का।

’मेयार’ इन्कलाब का परचम लिये हुए,
उतरा है आसमान से ये दल पलाश का।