Sunday, August 9, 2009

बनारस के कवि और शायर/रामदास अकेला

बनारस के शायर की अगली कडी़ में रामदास अकेला जी की रचनाएं प्रस्तुत हैं।आप की जन्मतिथि है २४-०३-१९४२|जन्मतिथि है-ग्राम-लखनेपुर,पो०-घनश्यामपुर जिला-जौनपुर| आप के पिता का नाम है- स्व० बलीराम भगत।आप प्रवर अधीक्षक [डाक विभाग] के पद से सेवा निवृत्त होकर साहित्य सेवा में संलग्न है।गीत,ग़ज़ल,मुक्तक एवं नवगीतों की रचना आप को विशेष रूप से पसन्द है।आप द्वारा रचित ‘आईने बोलते हैं’ ग़ज़ल संग्रह 1999 में प्रकाशित।आप की बहुत सी रचनाएं दूरदर्शन और आकाशवाणी पर प्रसारित हो चुकी हैं।आप अदबी-संगम[हिन्दी-उर्दू साहित्यिक संस्था]वाराणसी के अध्यक्ष तथा प्रगतिशील लेखक संघ के उपाध्यक्ष भी हैं।

1. कैसे-कैसे इसे गुजारी है :-

कैसे-कैसे इसे गुजारी है।
ज़िन्दगी यार फिर भी प्यारी है।

मालोज़र की कोई कमी तो नही,
हाँ मगर प्यार की दुश्वारी है।

ज़िन्दगी कौन कब तलक ढोता,
ये तो खु़द मौत की सवारी है।

बाप मरता तो भला कैसे वो,
जिसकी बेटी अभी कुँवारी है।

भार से डालियों के टूट रहे,
ये दरख्तों की अदाकारी है।

ये तो गुज़री है नींद में यारों,
भरम रहा कि शब्बेदारी है।

होश में कैसे ’अकेला’ रहता,
होशवालों में मारामारी है।


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2. ज़िन्दगी के वास्ते क्या-क्या है :-

ज़िन्दगी के वास्ते क्या-क्या है करता आदमी।
अपनी ही परछाइयों से डर के मरता आदमी।

अपने हक़ में कोई भी तामीर क्या कर पायेगा,
खण्डहरों की ईंट सा खुद ही बिखरता आदमी।

रख दिया है आईना जबसे सड़क के बीच में,
मुँह बनाता फेरकर चेहरा बनाता आदमी।

रंग, नस्लों, धर्म,मज़हब जातियां दर जातियां,
अनगिनत फिरकों में जुड़ता और बिखरता आदमी।

थे ज़मीं था आसमां परवाज में इसके कभी,
परकटे पंछी सा है अब फड़फडा़ता आदमी।

दावतों के बाद जूठन फेंक देता जब कोई,
ढेर पर कुडे़ के चुन कर पेट भरता आदमी।

किस कदर नाराज़ लगता है ये अपने आप से,
बुदबुदाता फिर रहा है पागलों सा आदमी।

ज़िन्दगी भर दूसरों की फ़िक्र में उलझा रहा,
अपने बारे में कभी कुछ फ़िक्र करता आदमी।

एक मुट्ठी खा़क पर करता रहा इतना गुमान,
काश मिट्टी की हकी़क़त को समझता आदमी।

अपनी इक पहचान तो इसको बनानी चाहिए,
काफ़िले के साथ हो या हो अकेला आदमी।


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3.बोलियाँ अब न भाषाएं वही :-

बोलियाँ अब न भाषाएं वही।
कब तलक गायेंगे गाथाएं वही।

कारवां लेकर हमारा चल पडे़,
जो खडी़ करते हैं बाधाएं वही।

आँख के अन्धे हैं लेकिन लिख रहे,
कौम के माथे की रेखाएं वही।

हम रहे अब भी लकीरों के फकीर,
तोड़ते अक्सर हैं सीमाएं वही।

अस्मिता जिनसे वतन की दावं पर,
हाय वन्देमातरम गाएं वही।

चीखते हैं जो धरम के नाम पर,
नफ़रतों की आग भड़काएं वही।

हाथ में लेकर चले हो आईना,
देखना पत्थर न फिर आएं वही।

चल ‘अकेला’कुछ नई बातें करें,
मत सुनाना फिर से कविताएं वही।

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4. चढ़ तो गये ऊँचाइयों पे धूमधाम से :-

चढ़ तो गये ऊँचाइयों पे धूमधाम से।
बदली नज़र तो गिर पडे़ औंधे धडा़म से।

करता रहा सलाम,कभी झुक के दूर से,
करने लगा है बात वही तुम-तडा़म से।

बदले हुए मौसम की ये तासीर खूब है,
मेढक भी परेशान है सर्दी-जु़काम से।

हाथों से निकल तोते बहुत दूर उड़ गये,
रखा था जिन्हें हमने बहुत एहतेमाम से।

औरों के हाल पर तो हँसे भूल क्यूँ गये,
तुमको भी गुजरना है कभी उस मुकाम से।

गुम होके रह गया है इसी भीड़ में कहीं,
निकला तो ‘अकेला’ था किसी और काम से।


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5. संसद से सड़कों तक देखा :-

संसद से सड़कों तक देखा सब उद्योग लगे।
बेकारी से फिर भी जूझते हमको लोग लगे।

खुद क्या थे,क्या हैं,क्या होंगे;क्या मालूम उन्हें,
औरों का कद छोता करने में जो लोग लगे।

वो क्या जाने भूख की शिद्दत कीमत रोटी की,
भक्तों के आटा-घी से ही जिनका भोग लगे।

हम खोये रहते तलाश में जीवन भर जिसकी,
उनकी नज़र में एक समाधी और संभोग लगे।

ईर्ष्या,द्वेष,अहं और नफरत,लालच,बेइमानी;
एक बेचारे मन को जाने कितने रोग लगे।

तनहाई में यूँ ही अकेला भटकेगा कब तक,
साथ तुम्हारे लोग भी आयें कब संयोग लगे।