मंगलवार, 13 मार्च 2012

औरों से तो झूठ कहोगे

 प्रस्तुत है एक आत्मविश्लेषणात्मक ग़ज़ल ( बहर  :-फेलुन फेलुन फेलुन फेलुन फेलुन फेलुन फेलुन फा )  :-

औरों से तो झूठ कहोगे, ख़ुद को क्या समझाओगे।
तनहाई में जब तुम ख़ुद से, अपनी बात चलाओगे।

झूठ, फरेब, दगाबाजी, नफरत, बेइमानी, मक्कारी,
करते हो, छलते हो सबको; पर कबतक छल पाओगे।

कुछ लम्हें ऐसे आते हैं, इन्सां जब पछताता है,
ऐसे लम्हें जब आयेंगे, तुम भी बहुत पछताओगे।

जीने की खातिर दुनिया में, तुम ये करते हो माना,
लेकिन औरों को दुख देकर, क्या सुख से जी पाओगे।

चोट किसी को देते हो खुश होते हो लेकिन सुन लो,
खुश ज्यादा होओगे किसी के, चोट को जब सहलाओगे।

जान बचाने में जो सुख है, कोई कातिल क्या जाने,
तुम ये ‘अनघ’ करके देखो तो, एक नया सुख पाओगे।

सोमवार, 5 मार्च 2012

ग़ज़ल/सारे बन्धन वो तोड़कर निकला

सभी ब्लागर साथियों को नमस्कार ! बहुत दिन हुए मैनें अपने ब्लाग पर लगातार कुछ नहीं लिखा। लीजिए प्रस्तुत है एक ग़ज़ल ( बहर  :-  फाइलातुन मफाइलुन फेलुन )  ....

सारे बन्धन वो तोड़कर निकला।
दर्द से मेरे बेखबर निकला ।

 
मैं लुटा तो मगर ये रंज मुझे,
लूटने वाला हमसफर निकला।

 
वक्त ने भी दिया दगा मुझको,
प्यार का वक्त मुक्तसर निकला ।

 
दूसरा कोई रास्ता ही नहीं,
अश्क ये आँख की डगर निकला।
 
ये शिकायत तेरे 'अनघ' से है,
बेवफाई की राह पर निकला।
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सोमवार, 10 अक्टूबर 2011

जगजीत सिंह- अब तो बस याद ही बाकी है...

एक दर्द, एक आह, एक चुभन, एक कभी न खत्म होने वाला दुख दे गये जगजीत सिंह जी ............। टी वी पर समाचार देखा तो सहसा विश्वास ही नहीं हुआ। पारम्परिक ग़ज़ल-गायकी से हटकर ग़ज़ल को एक नया आयाम देने वाले, ग़ज़ल को एक नई ऊँचाई देने वाले, महान संगीत साधक जगजीत सिंह जी ने दुनिया से कूच करके एक ऐसी रिक्तता दे दी है जिसे भरना शायद नामुमकिन है। अब दूसरा जगजीत सिंह कहाँ मिल सकता है।
             मैं अपने जीवन में दो पुरुष गायकों से बहुत प्रभावित रहा- एक तो मुकेश जी और दूसरे जगजीत सिंह जी। सच पूछिए तो मेरा संगीत में रुझान ही इनकी वजह से हुआ। आज मेरे दोनों आदर्श इस दुनिया में नहीं रहे........यकीन नहीं होता। कुछ साल पहले जब जगजीत सिंह जी बनारस आये थे तो उनको सुनने का मौका मिला था। मुझे एक घटना याद आ रही है। कुछ बच्चे उनसे बार -बार आटोग्राफ ले रहे थे और उनकी भीड़ बढ़ती ही जा रही थी। उस समय मैनें उनको बच्चों से शरारत करते हुये देखा था। उन्होंने एक बच्चे से कहा- पैसे लाये हो, तभी आटोग्राफ दूँगा। बच्चे ने कहा- नहीं, पैसे तो नहीं हैं। थोड़ी देर तक बच्चा परेशान रहा फिर उन्होंने हँसते हुये अपना आटोग्राफ दिया। सभी हंसने लगे।
             जगजीत सिंह जी के इस दुनिया से जाने के साथ-साथ मेरा भी एक सपना उनके साथ ही चला गया। मैं चाहता था कि मेरी किसी ग़ज़ल को उनकी आवाज़ मिले पर ...............
मेरी ओर से उन्हें विनम्र श्रद्धांजलि..............

मंगलवार, 26 जुलाई 2011

पर हैं लेकिन कटे हुए हैं

देर से ही सही लेकिन अपनी उपस्थिति पुनः दर्ज करा रहा हूँ। आशा है आप सभी को ये रचना पसन्द आयेगी.......

पर हैं लेकिन कटे हुए हैं।
इक हैं लेकिन बंटे हुए हैं।


अच्छे-अच्छे कहीं नहीं हैं,
गुण्डे आगे डटे हुए हैं ।


आवेदन नौकरी की मत दो,
जिनका होगा छंटे हुए हैं।


वह लड़की है नहीं है लड़का,
जिसके गेसू कटे हुए है।


तन ढकना है जहाँ जरूरी,
कपड़े उनके हटे हुए हैं।


जो तन ढकना चाह रही हैं,

उनके कपड़े फटे हुए हैं।


उनके अच्छे अंक हैं आते,
जो उत्तर को रटे हुए हैं।


सार्वजनिक उद्यान सभी अब,
बस जोड़ों से पटे हुए हैं।


रिश्ते-नाते ‘अनघ’ नाम के,
इक-दूजे से कटे हुए हैं।

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गुरुवार, 2 जून 2011

भूलने वाले मुझे याद कर

ब्लागजगत के सभी नये -पुराने साथियों को नमस्कार। कहीं आप मुझे भूल तो नहीं गये। अगर ऐसा है तो....

भूलने वाले मुझे याद कर, भूलने वाले मुझे याद आ।
तू मेरे दिल में बस कर, मुझे पने दिल में बसा।

ये जो तनहाई है मेरी दुश्मन ये तुमको भी सताती होगी,
मैं इधर जब तड़पता हूँ इतना ये तुमको भी तड़पाती होगी,
अब यही तू इक उपाय कर और तनहाइयों को भगा.........

है तुमको भी मेरी जरूरत और तू भी जरूरत है मेरी,
मैं हूँ तेरे हाथ की लकीरें और तू ही किस्मत है मेरी,
हाथ में हाथ फिर रख दे और सोई किस्मत को जगा......
Copyright@PBChaturvedi