मंगलवार, 17 फ़रवरी 2015

जा रहा है जिधर बेखबर आदमी

मैं प्रस्तुत रचना का संपादित प्रारूप प्रस्तुत कर रहा हूँ | आशा है इसका नया प्रस्तुतिकरण आपको पसंद आयेगा......
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रविवार, 25 जनवरी 2015

मेरे सपनों का भारत ऐसा भारत हो तो बेहतर हो

गणतंत्र दिवस के अवसर पर एक देशभक्ति गीत प्रस्तुत है | सभी ब्लॉगर बन्धुओं को गणतंत्र दिवस की शुभकामनाएं....आप इसे YOUTUBE पर सुन सकते है.....

सभी आगे बढ़े बढ़ते रहें ये ही निरंतर हो।
न लड़का कम किसी से हो न लड़की कोई कमतर हो।
न हो बेरोजगारी और अब कोई न हो अनपढ़,
मेरे सपनों का भारत ऐसा भारत हो तो बेहतर हो ।


न हों अब धर्म के झगड़े न हो अब जाति की बातें,
न दंगे हों कहीं पर भी न हों आतंक की घातें ,
कहीं भी हम कभी भी जा सकें तो भय रहित जाएं,
सुरक्षित दिन हमारा हो सुरक्षित रात भी हर हो ।
मेरे सपनों का भारत ऐसा भारत हो तो बेहतर हो।

हरेक चेहरे पे हो मुस्कान न कोई गमजदा अब हो,
न आलस, झूठ, भ्रष्टाचार, बेईमानी यहाँ अब हो,
कोई भी गिर पड़े तो मिल के हम उसको उठा लेंगे,
सभी के दिल में ही सहयोग का अब भाव गोचर हो।
मेरे सपनों का भारत ऐसा भारत हो तो बेहतर हो।

दिलों को जोड़ लेंगे हम, गमों को छोड़ देंगे हम,
जरूरत गर पड़ी तो रास्तों को मोड़ देंगे हम,
पड़ोसी मुल्क जो भी अब हमें आँखें दिखाएगा,
तो ऐसा हो भी सकता है कि वो भारत के अन्दर हो।
मेरे सपनों का भारत ऐसा भारत हो तो बेहतर हो।

न आँसू आँख में आये, न कोई दृष्टि कातर हो,
न अब इंसान और इंसान में अब कोई अंतर हो,
सभी का लक्ष्य बस भारत को अब आगे बढ़ाना हो,

सभी  के पास भारत माँ के कुछ प्रश्नों का उत्तर हो ।
मेरे सपनों का भारत ऐसा भारत हो तो बेहतर हो।

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गुरुवार, 25 दिसंबर 2014

मेरी बहन हर्षिता का शुभ विवाह (1-12-2014)

दिनांक २८-११-१४ को मेरी बहन हर्षिता का engangement और १-१२-१४ को विवाह संपन्न हुआ जिसके कुछ फोटो प्रस्तुत हैं :-

 



रविवार, 26 अक्टूबर 2014

आंधियाँ भी चले और दिया भी जले

मित्रों ! एक रचना अपनी आवाज़ में  प्रस्तुत कर रहा हूँ, आशा है आप को अवश्य पसंद आयेगी...
इस रचना का वास्तविक आनंद Youtube पर सुन कर ही आयेगा, इसलिए आपसे अनुरोध है कि आप मेरी मेहनत को सफल बनाएं और वहां इसे जरूर सुनें...



आंधियाँ भी चले और दिया भी जले ।
होगा कैसे भला आसमां के तले ।

अब भरोसा करें भी तो किस पर करें,
अब तो अपना ही साया हमें ही छले ।

दिन में आदर्श की बात हमसे करे,
वो बने भेड़िया ख़ुद जंहा दिन ढले ।

आवरण सा चढ़ा है सभी पर कोई,
और भीतर से सारे हुए खोखले ।

ज़िन्दगी की खुशी बांटने से बढ़े ,
तो सभी के दिलों में हैं क्यों फासले ।

कुछ बुरा कुछ भला है सभी को मिला ,
दूसरे की कोई बात फ़िर क्यों खले ।
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कृपया आप यहाँ अवश्य पधारें :-

श्री रामदरश मिश्र जी की एक कविता/कंचनलता चतुर्वेदी

रविवार, 12 अक्टूबर 2014

बड़ी मुश्किल है बोलो क्या बताएं...

अपनी आवाज़ में एक ग़ज़ल [ "मुफ़ाईलुन मुफ़ाईलुन फ़ऊलुन" पर आधारित ] प्रस्तुत कर रहा हूँ...
इस रचना का वास्तविक आनंद Youtube पर सुन कर ही आयेगा, इसलिए आपसे अनुरोध है कि आप मेरी मेहनत को सफल बनाएं और वहां इसे जरूर सुनें...



 
बड़ी मुश्किल है बोलो क्या बताएं
न पूछो कैसे हम जीवन बिताएं।


अदाकारी हमें आती नही है,
ग़मों में कैसे अब हम मुस्कुराएं।


अँधेरा ऐसा है दिखता नही कुछ,
चिरागों को जलाएं या बुझाएं।


फ़रेबों,जालसाजी का हुनर ये,
भला खुद को ही हम कैसे सिखाएं।


ये माना मुश्किलों की ये घडी़ है,
चलो उम्मीद हम फिर भी लगाएं।


सियासत अब यही तो रह गई है,
विरोधी को चलो नीचा दिखाएं।


अगर सच बोल दें तो सब खफ़ा हों,
बनें झूठा तो अपना दिल दुखाएं।
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