मंगलवार, 14 अप्रैल 2009

गीत/चाहा था हँसना हमको

चाहा था हँसना हमको रोना पड़ा ।
आसुँओं से आँखों को भिगोना
पड़ा

जैसे सावन की ये घटाएं सिर्फ़ बरसना जानें,
अंखिया बरसे दिल की हसरत को ये ना पहचाने,
चाहा था पाना जिसको खोना
पड़ा ...................

दिल की मेरी सारी बातें रह गयीं मेरे दिल में,
तनहाई ले आयी मुझको ग़म से भरे महफ़िल में,
हर इक खुशी से हाथ मुझको धोना
पड़ा ...........

रही बराबर दूरी हरदम मंजिल और कदम की,
पूरे जीवन रहीं बहारें ग़म से भरे मौसम की,
सर पे इतना बोझ गमों का ढोना
पड़ा ...........

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रविवार, 12 अप्रैल 2009

नाराजगी भी है तुमसे प्यार भी तो है

नाराजगी भी है तुमसे प्यार भी तो है ।
दिल तोड़ने वाले तू मेरा यार भी तो है ।

मुझे बेकरार कर गयी है ये तेरी बेरुखी,
और उसपे सितम ये तू ही करार भी तो है।


जब चाहता हूँ इतना तो क्यों ख़फ़ा न होऊं,
तेरे बिना मेरा जीना दुश्वार भी तो है ।


तुमसे ही मेरी जिन्दगी वीरान हुई है,
तुमसे ही जिन्दगी ये खुशगवार भी तो है।


दोनों के लुत्फ़ हैं यहां इस एक इश्क में,
कुछ जीत भी है इश्क में कुछ हार भी तो है।


वैसे तो मेरा दिल जरूर तुमसे ख़फ़ा है,
तुमको ही ढूंढता ये बार बार भी तो है ।

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रविवार, 5 अप्रैल 2009

सुनने के लिए है न सुनाने के लिए है

अपनी ये रचना मैं स्वर्गीय मोहम्मद सलीम राही को समर्पित करता हूँ जो आकाशवाणी वाराणसी में कार्यरत थे और एक अच्छे शायर थे।उन्होंने मेरी ग़ज़लों को बहुत सराहा और ये रचना उन्हें बहुत अच्छी लगती थी।इसको उन्हीं की वजह से सेतु [ एक संस्था जिसमें संगीतमय प्रस्तुति होती थी ] में शामिल किया गया था और इसे ambika keshari ने अपनी आवाज़ दी थी।

सुनने के लिए है न सुनाने के लिए है ।
ये बात अभी सबसे छुपाने के लिए है ।

दुनिया के बाज़ार में बेचो न इसे तुम ,
ये बात अभी दिल के खजाने के लिए है ।

इस बात की चिंगारी अगर फ़ैल गयी तो ,
तैयार जहाँ आग लगाने के लिए है ।

आंसू कभी आ जाए तो जाहिर न ये करना ,
ये गम तेरा मुझ जैसे दीवाने के लिए है ।


तुम प्यार की बातों को जुबां से नहीं कहना ,
ये बात निगाहों से बताने के लिए है ।
 
होता रहा है होगा 'अनघ' प्यार पे सितम ,
ये बात जमानों से ज़माने के लिए है ।

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शनिवार, 4 अप्रैल 2009

गीत/प्रसन्नवदन चतुर्वेदी /जिंदगी ने कई दिन दिखाए

जिंदगी ने कई दिन दिखाए ।
कभी रोये कभी मुस्कुराये ।

कभी पाते रहे कभी खोते रहे ,
कभी जगते रहे कभी सोते रहे ,
इस तरह वक्त हमने बिताये ।
कभी रोये कभी मुस्कुराए ।

कभी शिकवा किया कभी वादे किए ,
कभी हमने नए कुछ इरादे किए ,
तेज आंधी में भी न डगमगाए ।
कभी रोये कभी मुस्कुराए ।

कभी ठोकर मिला कभी आहें मिली ,
कभी मंजिल की ओर जाती राहें मिली ,
मंजिलों पे कदम भी बढाए ।
कभी रोये कभी मुस्कुराए ।

काम बनते रहे और बिगड़ते रहे ,
लोग मिलते रहे और बिछड़ते रहे ,
जो गए लौट कर फ़िर न आए ।
कभी रोये कभी मुस्कुराए ।

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शुक्रवार, 13 फ़रवरी 2009

जा रहा है जिधर बेखबर आदमी

जा रहा है जिधर बेखबर आदमी ।
वो नहीं मंजिलों की डगर आदमी ।


उसके मन में है हैवान बैठा हुआ,
आ रहा है हमें जो नज़र आदमी ।


नफरतों की हुकूमत बढ़ी इस कदर,
आदमी जल रहा देखकर आदमी ।


क्या करेगा ये दौलत मरने के बाद,
मुझको इतना बता सोचकर आदमी ।


राम से तू न डर तू खुदा से न डर ,
अपने दिल की अदालत से डर आदमी । 


हर बुराई सुराखें है इस नाव की,
जिन्दगी नाव है नाव पर आदमी ।
 

आदमी है तो कुछ आदमीयत भी रख,
गैर का गम भी महसूस कर आदमी ।


तू समझदार है ना कहीं और जा,
ख़ुद से ही ख़ुद कभी बात कर आदमी ।

 
दोस्त पर भी भरोसा नहीं अब 'अनघ',
आ गया है ये किस मोड़ पर आदमी ।
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