मंजिल को पाने की खातिर, कोई राह
बनानी होगी ।
दूर अंधेरे को करने को, शम्मा एक जलानी होगी ।
अंगारों पर चलना होगा , काँटों पर सोना होगा ;
कितने ख्वाब तोड़ने होंगे, कितनी चाह मिटानी
होगी ।
बस दो ही तो राहें अपने , इस जीवन में होती
हैं ;
अच्छी राह चुनो तो अच्छा, बुरी राह नादानी
होगी ।
इतना भी आसान नहीं है, मंजिल को यूँ पा लेना ;
कुछ पाने की खातिर तुमको, देनी कुछ कुर्बानी
होगी।
लीक से हटकर चलना तो अच्छा है लेकिन मुश्किल है;
दिल में हिम्मत जारी रखोगे तो बड़ी आसानी होगी ।
दुनिया वाले कुछ बोलेंगे, जैसी उनकी आदत है
लेकिन जब मंजिल पा लोगे, दुनिया पानी-पानी होगी ।
पैदा होकर मर जाते हैं, जाने कितने लोग यहाँ ;
आज ‘अनघ’ कुछ नया करो तो, तेरी अमर कहानी होगी
।
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शनिवार, 22 अगस्त 2009
मंजिल को पाने की खातिर
शुक्रवार, 21 अगस्त 2009
बनारस में एक कवि गोष्ठी
कुलदीप खन्ना,देवेन्द्र पांडे,अमित दहिया'बादशाह' उमाशंकर चतुर्वेदी'कंचन'
शिखा खन्ना और विकास
उमाशंकर चतुर्वेदी'कंचन',विंध्याचल पाण्डेय,प्रसन्न वदन चतुर्वेदी और शिवशंकर 'बाबा'
शिखा खन्ना और विकास
कुलदीप खन्ना,देवेन्द्र पांडे,
देवेन्द्र पांडे,अमित दहिया'बादशाह'
शुक्रवार, 14 अगस्त 2009
है कठिन इस जिंदगी के हादसों को
है कठिन इस जिंदगी के हादसों
को रोकना ।
मुस्कराहट रोकना या आसुओं को रोकना ।
वक्त कैसा आएगा आगे न जाने ये कोई ,
इसलिए मुश्किल है शायद मुश्किलों को रोकना ।
मंजिलों की ओर जाने के बने हैं वास्ते,
इसलिए मुमकिन नहीं है रास्तों को रोकना ।
इनको होना था तभी तो हो गए होते गए ,
चाहते तो हम भी थे इन फासलों को रोकना ।
दोस्तों के रूप में अक्सर छुपे रहते ‘अनघ’,
इसलिये आसां नहीं है दुश्मनों को रोकना ।
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भजन/दर्शन दो प्रभु कबसे खड़े हैं
दर्शन दो प्रभु कबसे खड़े हैं।
हम भारी विपदा में पड़े हैं।
कोई नहीं प्रभु-सा रखवाला,
मेरे कष्ट मिटाने वाला,
जीवन में कर दीजै उजाला;
आप दयालू नाथ बड़े हैं.......
झूठी माया झूठी काया,
लेकर मैं दुनिया में आया,
दुनिया में है पाप समाया;
भरते पाप के रोज़ घड़े हैं........
पाप हटे मिट जाये बुराई,
सबमें पडे़ प्रभु आप दिखाई,
इच्छाओं ने दौड़ लगाई;
कितनी गहरी मन की जड़े हैं.......
रविवार, 26 जुलाई 2009
गीत/मुझे याद आ रहे हैं,वो ज़िन्दगी के दिन
मुझे याद आ रहे हैं ,वो ज़िन्दगी के दिन।
कुछ मेरे ग़म के दिन,कुछ मेरी खुशी के दिन।
बचपन के खेल सारे, नानी की वो कहानी;
ससुराल जो गई है, उस बहन की निशानी;
झगडा़ करना,रोना और फिर हसीं के दिन......
कुछ और बडा़ होना,कुछ और सोचना;
ख्वाबों में,खयालों में; आकाश चूमना;
आज़ाद हर तरह से, कुछ बेबसी के दिन......
गप-शप वो दोस्तों के,और हम भी उसमें शामिल,
वो शोर वो ठहाके,यारों की हसीं महफ़िल;
वो किताब-कापियों के,वो दिल्लगी के दिन.....
कुछ उम्र बढी़ और, नौजवान हम हुए;
कितनी ही हसीनों के,अरमान हम हुए;
जब सोच में तब्दीली हुई उस घडी़ के दिन.....
अब ख्वाब में आने लगे,जुल्फ़ों के वो साये;
फिर जो भी हुआ उसको,अब कैसे हम बतायें;
दीवाने हो गये हम,दीवानगी के दिन.....
फिर जैसे बहार आई,घर मेरा खिल गया;
बावस्ता उम्र भर के,इक दोस्त मिल गया;
फिर फूल कुछ खिले और, नई रौशनी के दिन.....
बच्चे बडे़ हुए अपनी उम्र बढ़ गई;
चेहरे पे झुर्रियों की,सौगात चढ़ गई;
हुए खत्म धीरे-धीरे,जीवन की लडी़ के दिन.....
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