शनिवार, 22 अगस्त 2009

मंजिल को पाने की खातिर

मंजिल को पाने की खातिर, कोई राह बनानी होगी ।
दूर अंधेरे को करने को, शम्मा एक जलानी होगी ।

अंगारों पर चलना होगा , काँटों पर सोना होगा ;
कितने ख्वाब तोड़ने होंगे, कितनी चाह मिटानी होगी ।

बस दो ही तो राहें अपने , इस जीवन में होती हैं ;
अच्छी राह चुनो तो अच्छा, बुरी राह नादानी होगी ।

इतना भी आसान नहीं है, मंजिल को यूँ पा लेना ;
कुछ पाने की खातिर तुमको, देनी कुछ कुर्बानी होगी।

लीक से हटकर चलना तो अच्छा है लेकिन मुश्किल है;
दिल में हिम्मत जारी रखोगे तो बड़ी आसानी होगी ।

दुनिया वाले कुछ बोलेंगे, जैसी उनकी आदत है
लेकिन जब मंजिल पा लोगे, दुनिया पानी-पानी होगी ।

पैदा होकर मर जाते हैं, जाने कितने लोग यहाँ ;
आज ‘अनघ’ कुछ नया करो तो, तेरी अमर कहानी होगी ।

Copyright@PBChaturvedi

शुक्रवार, 21 अगस्त 2009

बनारस में एक कवि गोष्ठी

दिनांक 20-08-09 को वाराणसी में नई दिल्ली से पधारे श्री अमित दहिया ‘बादशाह’,कुलदीप खन्ना,सुश्री शिखा खन्ना,विकास आदि की उपस्थिति में श्री उमाशंकर चतुर्वेदी‘कंचन’ के निवास स्थान पर एक काव्य-गोष्ठी का आयोजन हुआ जिसमें इनके और मेरे अतिरिक्त देवेन्द्र पाण्डेय,नागेश शाण्डिल्य,विन्ध्याचल पाण्डेय, ,शिवशंकर ‘बाबा’,अख्तर बनारसी आदि कवि मित्रों ने भाग लेकर काव्य-गोष्ठी को एक ऊचाँई प्रदान की।प्रस्तुत काव्य-गोष्ठी के कुछ चित्र मेरे ब्लॉग 'कुछ हमसे सुनो कुछ हमसे कहो' पर देंखे ....

कुलदीप खन्ना,देवेन्द्र पांडे,अमित दहिया'बादशाह' उमाशंकर चतुर्वेदी'कंचन'














शिखा खन्ना और विकास















उमाशंकर चतुर्वेदी'कंचन',विंध्याचल पाण्डेय,प्रसन्न वदन चतुर्वेदी और शिवशंकर 'बाबा'














शिखा खन्ना और विकास













































कुलदीप खन्ना,देवेन्द्र पांडे,














देवेन्द्र पांडे,अमित दहिया'बादशाह'















शुक्रवार, 14 अगस्त 2009

है कठिन इस जिंदगी के हादसों को

है कठिन इस जिंदगी के हादसों को रोकना ।
मुस्कराहट रोकना या आसुओं को रोकना ।

वक्त कैसा आएगा आगे न जाने ये कोई ,
इसलिए मुश्किल है शायद मुश्किलों को रोकना ।

मंजिलों की ओर जाने के बने हैं वास्ते,
इसलिए मुमकिन नहीं है रास्तों को रोकना ।

इनको होना था तभी तो हो गए होते गए ,
चाहते तो हम भी थे इन फासलों को रोकना ।

दोस्तों के रूप में अक्सर छुपे रहते ‘अनघ’,
इसलिये आसां नहीं है दुश्मनों को रोकना ।

Copyright@PBChaturvedi


भजन/दर्शन दो प्रभु कबसे खड़े हैं

आज श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के शुभ अवसर पर मैं अपना लिखा एक भजन प्रस्तुत कर रहा हूँ.....

दर्शन दो प्रभु कबसे खड़े हैं।
हम भारी विपदा में पड़े हैं।

कोई नहीं प्रभु-सा रखवाला,
मेरे कष्ट मिटाने वाला,
जीवन में कर दीजै उजाला;
आप दयालू नाथ बड़े हैं.......

झूठी माया झूठी काया,
लेकर मैं दुनिया में आया,
दुनिया में है पाप समाया;
भरते पाप के रोज़ घड़े हैं........

पाप हटे मिट जाये बुराई,
सबमें पडे़ प्रभु आप दिखाई,
इच्छाओं ने दौड़ लगाई;
कितनी गहरी मन की जड़े हैं.......
Copyright@PBChaturvedi

रविवार, 26 जुलाई 2009

गीत/मुझे याद आ रहे हैं,वो ज़िन्दगी के दिन

आज मैं एक ऐसा गीत यहाँ प्रस्तुत कर रहा हूँ जो कई मायनों में एकदम अलग है।इस गीत की खा़सियत यह है कि पूरे जीवन का वर्णन एक गीत में ही हो जाता है।है अनोखी बात!मुझे यकीन है कि आप को मेरा यह गीत जरूर पसन्द आयेगा क्योंकि यह आप के जीवन की कहानी भी तो बयां कर रहा है.........

मुझे याद आ रहे हैं ,वो ज़िन्दगी के दिन। 

कुछ मेरे ग़म के दिन,कुछ मेरी खुशी के दिन। 

 बचपन के खेल सारे, नानी की वो कहानी; 

ससुराल जो गई है, उस बहन की निशानी; 

झगडा़ करना,रोना और फिर हसीं के दिन...... 

कुछ और बडा़ होना,कुछ और सोचना; 

ख्वाबों में,खयालों में; आकाश चूमना; 

आज़ाद हर तरह से, कुछ बेबसी के दिन...... 

गप-शप वो दोस्तों के,और हम भी उसमें शामिल, 

वो शोर वो ठहाके,यारों की हसीं महफ़िल; 

वो किताब-कापियों के,वो दिल्लगी के दिन..... 

 कुछ उम्र बढी़ और, नौजवान हम हुए; 

कितनी ही हसीनों के,अरमान हम हुए; 

जब सोच में तब्दीली हुई उस घडी़ के दिन..... 

अब ख्वाब में आने लगे,जुल्फ़ों के वो साये; 

फिर जो भी हुआ उसको,अब कैसे हम बतायें; 

दीवाने हो गये हम,दीवानगी के दिन..... 

फिर जैसे बहार आई,घर मेरा खिल गया; 

बावस्ता उम्र भर के,इक दोस्त मिल गया; 

फिर फूल कुछ खिले और, नई रौशनी के दिन..... 

बच्चे बडे़ हुए अपनी उम्र बढ़ गई; 

चेहरे पे झुर्रियों की,सौगात चढ़ गई; 

हुए खत्म धीरे-धीरे,जीवन की लडी़ के दिन.....

 Copyright@PBChaturvedi