दर्द से मेरे बेखबर निकला ।
मैं लुटा तो मगर ये रंज मुझे,
लूटने वाला हमसफर निकला।
वक्त ने भी दिया दगा मुझको,
प्यार का वक्त मुक्तसर निकला ।
दूसरा कोई रास्ता ही नहीं,
अश्क ये आँख की डगर निकला।
बेवफाई की राह पर निकला।
पर हैं
लेकिन कटे हुए हैं।
इक हैं लेकिन बंटे हुए हैं।
अच्छे-अच्छे कहीं नहीं हैं,
गुण्डे आगे डटे हुए हैं ।
आवेदन नौकरी की मत दो,
जिनका होगा छंटे हुए हैं।
वह लड़की है नहीं है लड़का,
जिसके गेसू कटे हुए है।
तन ढकना है जहाँ जरूरी,
कपड़े उनके हटे हुए हैं।
जो तन ढकना चाह रही हैं,
उनके कपड़े फटे हुए हैं।
उनके अच्छे अंक हैं आते,
जो उत्तर को रटे हुए हैं।
सार्वजनिक उद्यान सभी अब,
बस जोड़ों से पटे हुए हैं।
रिश्ते-नाते ‘अनघ’ नाम के,
इक-दूजे से कटे हुए हैं।
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वक्त ये
एक-सा नहीं होता।
वक्त किसका बुरा नहीं होता।
वक्त की बात है नहीं कुछ और,
कोई अच्छा-बुरा नहीं होता।
इस जहाँ में नहीं जगह ऐसी,
दर्द कोई जहाँ नहीं होता।
हों चमन
में अगर नहीं काटें,
फूल कोई वहाँ नहीं होता।
पल जो
ग़मगीन गर नहीं आते,
वक्त ये खुशनुमा नहीं होता।
प्यार
क्या है नहीं समझते सब,
गर कोई बेवफा नहीं होता।
जब कसौटी
पे वक्त कसता है,
हर कोई तब खरा नहीं होता।
होता
भगवान पर यकीं सबको,
जब कोई आसरा नहीं होता।
हर जगह आप
ही तो होते हैं,
ऐ ‘अनघ’ दूसरा नहीं होता।
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