शुक्रवार, 21 सितंबर 2018

चन्द्रकान्ता उपन्यास अध्याय-प्रथम, बयान- 1

दोस्तों ! पं देवकीनंदन खत्री के प्रसिद्ध हिंदी जासूसी उपन्यास "चन्द्रकान्ता" के प्रथम अध्याय के पहले बयान का वाचन प्रतिरूप प्रस्तुत है, यू-ट्यूब पर आपको ये लगातार धारावाहिक के रूप में सुनने को मिलेगा | आशा है आपको ये अवश्य पसंद आयेगा......

चन्द्रकान्ता उपन्यास, अध्याय-प्रथम, बयान-1
उपन्यासकार: पं देवकीनंदन खत्री 
स्वर :प्रसन्न वदन चतुर्वेदी

चन्द्रकान्ता उपन्यास अध्याय-प्रथम, बयान- 1
 

शुक्रवार, 23 मार्च 2018

जब अपना कोई छल करता...

दिल छलनी-छलनी होता है जब अपना कोई छल करता |
फिर भी नहीं यकीं होता है जब अपना कोई छल करता |

जीवन के झंझावातों में हर गम सह लेते हैं हम सब,
दर्द वो ज्यादा ही होता है जब अपना कोई छल करता |

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बुधवार, 7 जून 2017

अम्मा चली गयीं मेरे पापा चले गए

लगभग एक साल के अंतराल पर मैंने अपने माता-पिता दोनों को (24-3-2016 को माँ और 24-5-2017 को पिता को) खो दिया है।  प्रस्तुत है इस समय मेरे मन की भावना (अभी मैंने कोई मात्रा या बहर नही देखा है, वो बाद में देखूँगा) ...
अम्मा चली गयीं मेरे पापा चले गए।
दुनिया में मुझको छोड़ अकेला चले गए।
 
बचपन के लाड़-प्यार वो दुलार अब कहाँ,
देकर वो मुझको दौर सुनहरा चले गए।
 
वो जब तलक थे दिल से मैं बच्चा ही था अभी,
लेकर ज्यूँ मेरे दिल का वो बच्चा चले गए।
 
होती है अहमियत किसी की जाने के बाद ही,
अहसास हो रहा है जब वो सहसा चले गए।
 
अब भी यकीं नही मुझे क्यों हो रहा है ये,
कल तक तो साथ-साथ थे, यूँ कहाँ चले गए।
 
उनकी कमी खलेगी अब ताउम्र ही मुझे, 
अरमान उनके पूरे हों, वो जहाँ चले गए।

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गुरुवार, 11 मई 2017

एक रचना/ प.धर्मशील चतुर्वेदी जी की जयन्ती पर विशेष

काशी की अमर विभूति प.धर्मशील चतुर्वेदी जी की जयन्ती  पर विशेष...

"धर्मशील जी व्यक्ति नहीं थे, संस्कृति के संवाहक थे |
काशी की हर एक सभा के आजीवन संचालक थे |
काशी की हर एक सभा में अट्टहास उनका गूँजा,
उनके जैसा जिंदादिल अब और नहीं कोई दूजा,
कला-पारखी, ज्ञानवान थे, निश्छल मानों बालक थे.....
धर्म, कला, साहित्य सभी पर, उनका दखल बराबर था,
न्यायालय या कोई सभा हो सबमे उनका आदर था,
व्यंग्यकार, अधिवक्ता, उम्दा लेखक और विचारक थे....."



गुरुवार, 3 नवंबर 2016

यही अब दोस्तों की दोस्ती है

एक ग़ज़ल ( 'मुफाईलुन मुफाईलुन फऊलुन'  पर आधारित ) प्रस्तुत है...

यही अब दोस्तों की दोस्ती है |

कभी भी हाल तक पूछा नहीं है |

 

ठहाके मार के हंसना, बिहंसना

मुझे वो आजतक भूला नहीं है |

 

बिना बातों के वो बातें बनाना,

उन्ही बातों की अब शायद कमी है |

 

किसी के पास मंजिल का पता है,

किसी के दिल की दुनिया लुट गयी है |

 

यही तो ज़िंदगी का फलसफा है,

कहीं खुशियाँ कहीं वीरानगी है |

 

जिए तो जा रहे हैं ज़िंदगी, पर

ये लगता है कहीं कोई कमी है |

 

अभी खुशबू नहीं छाई फिजां में,

अँधेरे में अभी तक रौशनी है |

 

बुरा मत बोलना, सुनना, न कहना

किसी ने खूब ये बातें कही है |

 

‘अनघ’ आता नहीं आनन्द तब भी,

बहुत आराम में गर ज़िंदगी है |  
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