गुरुवार, 31 अक्टूबर 2013

जब भी जली है बहू जली है- दहेज़ पर एक रचना

मित्रो, आज आप के लिए दहेज़ पर एक रचना प्रस्तुत कर रहा हूँ | आप ने अक्सर देखा होगा जब भी ऐसी कोई खबर आती है तो उसमें सिर्फ बहू जलती है और वह भी तब जब कोई नहीं रहता, सभी जलने के बाद ही पंहुचते है | ख़ास तौर से सीधी-साधी बहुओं के साथ ये ज्यादा होता है | काश ! लोग सभी को इंसान समझते...

जब भी जली है बहू जली है सास कभी भी नहीं जली है |
जब भी जली सब दूर रहे हैं पास कभी भी नहीं जली है |

जितना भी मिलता जाता है उतना ही कम लगता है,
और मिले कुछ और मिले ये आस कभी भी नहीं जली है |

हम हिन्दू तो मरने पर ही लाश जलाया करते हैं,
वो जीते-जी जली है उसकी लाश कभी भी नहीं जली है |

कभी-कभी कुछ ऐब भी अक्सर चमत्कार दिखलाते हैं,
सीधी-साधी जल जाती बिंदास कभी भी नहीं जली है |

इस रचना को यू-ट्यूब जरुर पर सुनिए- 

 
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बुधवार, 14 अगस्त 2013

भारत माँ हम तेरे बच्चे

स्वतंत्रता-दिवस पर देशभक्ति पर आधारित एक बालगीत प्रस्तुत कर रहा हूँ...

भारत माँ हम तेरे बच्चे,आज शपथ ये खायेंगे |
वक्त पड़ा तो तेरी खातिर, सर को भी कटायेंगे |

हम तेरी गोदी में रहते, हँसते, खाते, पीते हैं,
तेरी ममता की छाया में, हम सारे ही जीते हैं,
हमको आज़ादी दी तूने, जीवन में कुछ करने की,
हमको आज़ादी दी तूने, जैसे चाहे रहने की,
अपनी इस आज़ादी को हम, कैसे भला भुलायेंगे....
वक्त पड़ा तो तेरी खातिर, सर को भी कटायेंगे |

चाहे राम हो, कृष्ण हो चाहे, बुद्ध, महावीर, साईं हों,
नानक, तुलसी, सूरदास हों, मीरा, लक्ष्मीबाई हों,
राजगुरु, सुखदेव, भगतसिंह, गांधी या आज़ाद हों,
तेरी माटी में सब जन्मे, हम भी इनके बाद हों,
अपने कर्मों से हम इनमें, अपना नाम लिखायेंगे....
वक्त पड़ा तो तेरी खातिर, सर को भी कटायेंगे |

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  सभी को स्वतंत्रता-दिवस पर  बहुत बहुत बधाई...

बुधवार, 17 जुलाई 2013

तुम क्या दोगे साथ, किसी का कोई साथ नहीं देता है

प्रस्तुत है एक रचना जो मुझे उम्मीद है आपको अवश्य पसंद आयेगी...

तुम क्या दोगे साथ किसी का कोई साथ नहीं देता है |
सच्ची है ये बात किसी का कोई साथ नहीं देता है |

मतलब की यें बातें हमको आपस में  जोड़े रखती हैं,
हरदम ये हालात किसी का कोई साथ नहीं देता है |

हमने तुमको अपना समझा गलती मेरी  माफ़ करो तुम ,
याद रहेगी बात किसी का कोई साथ नहीं देता है |

सच्चाई को देर से जाना अपनी ख़ता तो बस इतनी है,
जानी खा कर  मात किसी का कोई साथ नहीं देता है |

उम्मीदों  से आते हैं पर खाली हाथ चले जाते हैं,
कह उठते ज़ज्बात किसी का कोई साथ नहीं देता है |

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मंगलवार, 25 जून 2013

मानवता अब तार-तार है

         मित्रों ! उत्तराखंड की घटना ने एक ऐसा घाव छोड़ा है जो शायद बरसों तक नहीं भर सकता | सबसे ज्यादा दुःख तो तब हुआ जब उस समय की कई घटनाओं के बारे में पता चला | कोई पानी बिना मर रहा था और कुछ लोग उस समय पानी का सौदा कर रहे थे और २०० रुपये अधिक दाम एक बोतल पानी का वसूल रहे थे | कुछ उस समय लाशों पर से गहने उतार रहे थे, और इसके लिए उन्होनें उन शवों की उंगलियाँ काटने से गुरेज नहीं किया | उनके सामने कई लोग मदद के लिए पुकार रहे थे मगर उन्होंने उन्हें अनसुना कर अपना काम जारी रखा | क्या हो गया है हमारे समाज को ? मानवता को ? कुछ पंक्तियाँ अपने–आप होंठ गुनगुनाते गए जिन्हें मैं आप को प्रेषित कर रहा हूँ |
       
मानवता अब तार-तार है, नैतिकता अब कहीं दफ़न है |
बीते पल ये कहते गुजरे, संभलो आगे और पतन है |

लुटे हुए को लूट रहे हैं, मरे हुए को काट रहे हैं;
कुछ ऐसे हैं आफ़त में भी; रुपये, गहने छांट रहे हैं;
मरते रहे कई पानी बिन, वे अपने धंधे में मगन हैं......

जो शासक हैं देख रहे हैं, उनको बस अपनी चिंता है;
मरती है तो मर जाए ये, ये जनता है वो नेता हैं;
आग लगाने खड़े हुए हैं जनता ओढ़े हुए कफ़न है...

भर जाते हैं घाव बदन के, मन के जख्म नहीं भरते;
आफ़त ही ये ऐसी आई, करते भी तो क्या करते;
क्या वे फिर से तीर्थ करेंगे, उजड़ा जिनका ये जीवन है...

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