Monday, August 31, 2020

ग़ज़ल : हमारा दिल बहुत सहमा हुआ है

हमारा दिल बहुत सहमा हुआ है।
किसी को क्या बताएं क्या हुआ है।

निकलना फिर घरों से रुक गया है, 
शहर में फिर कहीं दंगा हुआ है।

सभी सम्भ्रान्त अंधे हो गए हैं,
व्यवस्थाओं का रुख बहरा हुआ है।

तरक्की हो रही है फाइलों में,
हक़ीक़त में शहर ठहरा हुआ है।

किसी पर जब यकीं हम दिल से करते,
हमारे साथ तब धोखा हुआ है।

तुम्हीं अहसास के मारे नही हो,
हमारे साथ भी ऐसा हुआ है।

हवा में है जहर, पानी भी दूषित,
तरक्की का सिला इतना हुआ है।



Friday, May 1, 2020

कहाँ हैं राम कैसे हैं बताएं : प्रसन्न वदन चतुर्वेदी : पंचगंगा घाट

मित्रों ! मैं अपनी प्रिय रचनाओं में से एक प्रस्तुत कर रहा हूँ जिसे मैंने पंचकवि चौरासी घाट कार्यक्रम के अंतर्गत वाराणसी के पंचगंगा घाट पर प्रस्तुत किया था | इसे आप मेरी आवाज में सुनेंगे तो और अधिक आनन्द आएगा, इसमें कोई संदेह नहीं है | इसीलिए इसका वीडियो लिंक भी नीचे दिया है, जिसे आप सुन सकते हैं  | आशा ही नहीं बल्कि पूर्ण विश्वास है कि आप को ये रचना अवश्य पसंद आएगी...
कहाँ हैं राम कैसे हैं बताएं |
जरूरत है धरा पर आप आएं |

नहीं है अब कहीं सम्बन्ध ऐसे, जो रामायण में बरसों से पढ़ा है,
नहीं है त्याग और आदर्श ऐसे, तेरे इतिहास ने जिनको गढ़ा है,
कई प्रतिमान तुमने हैं दिखाए, कहीं जिनको नहीं हम आज पाएं |

न बेटा आप जैसा बन सके हम, न भाई आप जैसा कोई पाया,
न धन-दौलत कभी ठुकरा सके हम, न जंगल में कभी जीवन बिताया,
दिए स्वारथ, अहम के बुझ न पाए, भले रावण यहाँ हम सब जलाएं |

किसी को पाप करते देखकर भी, कभी रोका नहीं टोका नहीं है,
दिखे हर ओर भ्रष्टाचार इतना, ये संस्कारों से क्या धोखा नहीं है,
व्यथा अपनी भला किसको सुनाएं, कहीं आदर्श सारे खो न जाएं |

नहीं है निर्भया निर्भय यहाँ अब, सुरक्षित अब नहीं कोई प्रियंका,
नरों के भेष में हम भेड़िये हैं, बजा लें लाख संस्कारों का डंका,
हकीकत इक-न-इक दिन खुल ही जाए, भले हम लाख मुहँ अपना छिपाएं |

दरिन्दे घूमते हैं अब यहाँ पर, दया संवेदना दिखती नहीं है,
निकलती जब अकेली घर से बेटी, लगे डर जब तलक आती नहीं है,
पढ़ाओ बेटियाँ नारा लगाएं, बचे बेटी तो हम बेटी पढाएं |


Monday, April 27, 2020

दुखवा हमार मईया टारीं-कोरोना पर एक भोजपुरी देवी गीत

इस समय पूरा विश्व कोरोना की चपेट में त्राहि-त्राहि कर रहा है, इसी समय नवरात्रि में इस रचना का प्रादुर्भाव हुआ जिसे संगीतबद्ध भी किया है | मेरे लिखे इस भजन को आप मेरी आवाजऔर मेरी बेटी शाम्भवी की आवाज में सुन सकते हैं | आशा है आप सभी को यह गीत पसंद आयेगा...

दुखवा हमार मइया टारीं, तोहरे शरण हम बानी |

सारा संसार में आइल बा बिपतिया,
रोग से मरत बाड़न लोग दिन-रतिया,
कोरोना फइलल महामारी, रउरे शरण हम बानी |

काम नाही काज नाही क़ैद सब घरवा,
निकले में डर लागे अपनो दुअरवा,
बिपदा पड़ल बाटे भारी तोहरे शरण हम बानी |

नवरात आइल बा आस बा इ जागल,
जे भी पुकारी ओकर दुख दउड़ी भागल,
संकट से मइया अब उबारीं रउरे शरण हम बानी |



Monday, April 13, 2020

ग़ज़ल : कितने झंझावात सहे हैं


कोरोना काल में हुई परिस्थितियों पर यह रचना प्रस्तुत है.....

कितने झंझावात सहे हैं, हम ये दुःख भी सह लेंगे |
दर-दर भटका करते थे हम, अपने घर में रह लेंगे|

अरसे बाद मिली है फुरसत, हर अपने से मिलने की,
कुछ सुन लेंगे उनकी हम कुछ अपने दिल की कह लेंगे |

यन्त्रों का युग है जीवन भी हम यन्त्रों-सा जीते हैं,
मानव-जीवन की सरिता ये, इसमें कुछ दिन बह लेंगे |

चिंता इसकी, उसकी, सबकी, अक्सर करते रहते थे,
कब सोचा था बिन चिंता के, हम सब कुछ दिन रह लेंगे |

नदियों की कल-कल मीठी है, आज हवा भी महकी-सी,
मन की सन्दूकों में ऐसी, यादें कर रख तह लेंगे |

ना खोना है ना पाना कुछ, ऐसे पल कब मिलते हैं,
औरों को तो देख चुके हैं, खुद को कुछ दिन गह लेंगे |

Copyright@प्रसन्न वदन चतुर्वेदी

Sunday, July 14, 2019

चन्द्रकान्ता उपन्यास अध्याय-प्रथम, बयान-21

दोस्तों ! पं देवकीनंदन खत्री के प्रसिद्ध हिंदी जासूसी उपन्यास "चन्द्रकान्ता" के प्रथम अध्याय के इक्कीसवें बयान का वाचन प्रतिरूप प्रस्तुत है, यू-ट्यूब पर आपको ये लगातार धारावाहिक के रूप में सुनने को मिलेगा | आशा है आपको ये अवश्य पसंद आयेगा...... 

चन्द्रकान्ता उपन्यास अध्याय-प्रथम, बयान-21
उपन्यासकार: पं देवकीनंदन खत्री
स्वर : प्रसन्नवदन चतुर्वेदी

Sunday, May 12, 2019

चन्द्रकान्ता : अध्याय-प्रथम, बयान-20

दोस्तों ! पं देवकीनंदन खत्री के प्रसिद्ध हिंदी जासूसी उपन्यास "चन्द्रकान्ता" के प्रथम अध्याय के बीसवें बयान का वाचन प्रतिरूप प्रस्तुत है, यू-ट्यूब पर आपको ये लगातार धारावाहिक के रूप में सुनने को मिलेगा | आशा है आपको ये अवश्य पसंद आयेगा...... 

चन्द्रकान्ता उपन्यास अध्याय-प्रथम, बयान-20
उपन्यासकार: पं देवकीनंदन खत्री
स्वर : प्रसन्नवदन चतुर्वेदी

Friday, May 10, 2019

काशी पर एक कविता- प्रसन्न वदन चतुर्वेदी

तीन लोक से न्यारी काशी, इसकी अमर कहानी है |
धर्म,कला,साहित्य, चिकित्सा, संस्कृति की राजधानी है |
1.
यहाँ पे बाबा विश्वनाथ हैं, संकटमोचन बसते हैं,
माँ दुर्गा, अन्नपूर्णा जी हैं, भैरव जी भी रहते हैं,
काशी में गंगा जी उत्तरवाहिनी होकर बहती हैं,
है नगरी प्राचीन कई घाटों की निशानी कहती है,
सारनाथ में यहीं बुद्ध ने प्रथम बार उपदेश दिया,
जैन धर्म के पार्श्वनाथ जी ने काशी में जन्म लिया,
रामानंद, कबीर और रैदास यहीं के निवासी थे,
धन्वन्तरि, पतंजलि, ऋषि अगस्त्य यहाँ के वासी थे,
श्री वल्लभ आचार्य, शंकराचार्य, पाणिनि यहाँ रहे,
वेद व्यास,  तुलसी, कबीर ने यहीं पे कितने ग्रन्थ रचे,
रानी लक्ष्मीबाई ने भी काशी में ही जन्म लिया,
झाँसी की रानी बन जिसने जीवन अपना धन्य किया,
सभी तरह के शल्य-क्रिया के प्रथम प्रणेता सुश्रुत थे,
काशी उनकी कर्मभूमि थी आयुर्वेद-चिकित्सक थे,
राजा हरिश्चन्द्र की नगरी, इसका कोई न सानी है......... 
तीन लोक से न्यारी काशी, इसकी अमर कहानी है |

2.
भारतेन्दु श्री हरिश्चन्द्र ने एक नया उत्थान किया,
हिन्दी को इक नई धार दी, एक नई पहचान दिया,
प्रेमचन्द, जयशंकर, देवकीनन्दन, हजारी द्विवेद्वी,
रामचन्द्र शुक्ला, विद्यानिवास, धूमिल और तेग अली,
बलदेव उपाध्याय, क्षेत्रेशचन्द्र, वागीश शास्त्री यहाँ रहे,
काशी की धरती पर ही नज़ीर बनारसी ने शेर कहे,
रामदास, गिरिजा देवी, छन्नू, राजन-साजन मिश्रा,
काशी की धरती से ही इनके सरगम का स्वर है गूंजा,
रविशंकर सितारवादन में तो शहनाई में बिस्मिल्ला,
तबले में गुदई, किशन, अनोखेलाल मिश्र की  ना, धिन, ना;
एन.राजम, ओंकारनाथ की कर्मभूमि ये काशी है,
लालबहादुर शास्त्री जी की जन्मभूमि भी काशी है,
है महामना की धरती ये शिक्षा की नगरी कहलाती,
शिव की नगरी, दीपों का शहर, मंदिर का शहर भी है काशी,
विद्वानों की है ये नगरी, प्राचीनतम निशानी है.......... 
तीन लोक से न्यारी काशी, इसकी अमर कहानी है |