Sunday, May 31, 2009

अब किसी पर नहीं रह गया ऐतबार

अब किसी पर नहीं रह गया ऐतबार,
जो भी मेरे थे मुझको न मेरे लगे |
मुझको अपनों ने लूटा बहुत इस कदर,
दोस्त भी जो मिले तो लुटेरे लग |

गैर हो तो मैं शिकवा शिकायत करूँ,
अब मैं अपनों की कैसे खिलाफत करूँ,
जब कभी कहना चाहा कोई बात तो,
रोकने के लिए कितने घेरे लगे |

रात जाने लगी फ़िर सवेरा हुआ,
दूर फ़िर भी न मन का अँधेरा हुआ,
रौशनी ने दिए इतने धोखे मुझे,
ये उजाले भी मुझको अंधेरे लगे |

Saturday, May 30, 2009

मुहब्बत है मुहब्बत है मुझे तुमसे मुहब्बत है।

मुहब्बत है मुहब्बत है मुझे तुमसे मुहब्बत है।
जरुरत है जरुरत है मुझे तेरी जरुरत है |

है गोरा रंग तेरा काली आँखें सुर्ख लब तेरे,
कि चाहत है हाँ चाहत है मुझे इनकी ही चाहत है।

तुम इतनी खूबसूरत हो कि हर तारीफ़ कम होगी,
कयामत है कयामत है हुश्न तेरा कयामत है ।

खुदाई इश्क है तेरा और तू है खुदा मेरी,
इबादत है इबादत है इश्क मेरा इबादत है।

मुझे भी देख लेते हो कभी तुम अपनी आँखों से,
इनायत है इनायत है तुम्हारी ये इनायत है।

तसव्वुर में तुम्हें लाता हूँ तो मुझको ऐसा लगता है,
जियारत है जियारत है यही तेरी जियारत है।

ये मेरा दिल लो तुम ले लो जैसे चाहो इस से खेलो,
इजाज़त है इजाज़त है तुम्हें इसकी इजाज़त है।

सच बताया ये दोष मेरा था।

सच बताया ये दोष मेरा था।
ग़म उठाया ये दोष मेरा था।

दर्द से रोना चाहिये था मुझे,
मुस्कुराया ये दोष मेरा था।

सर झुकाना नहीं था मुझको जहाँ,
सर झुकाया ये दोष मेरा था।

टूटनेवाली दोस्ती के लिये,
सब लुटाया ये दोष मेरा था।

नफ़रतों का जहान है फ़िर भी,
दिल लगाया ये दोष मेरा था।

दोस्तों के भी दुश्मनों के भी,
काम आया ये दोष मेरा था।

Thursday, May 21, 2009

फुलवारी/पाँच रचनाकारों की रचनायें

फुलवारी के इस अंक में प्रस्तुत है इन ग़ज़लकारों की रचनायें-

-जहीर कुरेशी की ग़ज़ल-


तिमिर की पालकी निकली अचानक।
घरों से गुल हुई बिजली अचानक।

तपस्या भंग-सी लगने लगी है,
कहाँ से आ गयी ’तितली’ अचानक।

अभी सामान तक खोला नहीं था,
यहाँ से भी हुई बदली अचानक।

समझ में आ रहा है स्वर पिता का,
विमाता कर गई चुगली अचानक।

तुम्हारी साम्प्रदायिक-सोच सुनकर,
मुझे आने लगी मितली अचानक।

ये पापी पेट भरने की सजा है,
नचनिया, बन गई तकली अचानक।

मछेरे की पकड़ से छूटते ही,
नदी में जा गिरी मछली अचानक।

पता-समीर काटेज,बी-२१,सूर्य नगर
शब्द प्रताप आश्रम के पास,
ग्वालियर-४७४०१२[म०प्र०]
मोबाइल न०-०९४२५७९०५६५


-रामकुमार 'कृषक' की ग़ज़ल-

हम हुए आजकल नीम की पत्तियाँ।
लाख हों रोग हल नीम की पत्तियाँ।

गीत गोली हुए शेर शीरीं नहीं,
कह रहे हम ग़ज़ल नीम की पत्तियाँ।

खून का घूँट हम खून वे पी रहे,
स्वाद देंगी बदल नीम की पत्तियाँ।

सुर्ख संजीवनी हों सभी के लिये,
हो रही खुद खरल नीम की पत्तियाँ।

आग की लाग हैं सूखते बाँसवन,
अब न होंगी सजल नीम की पत्तियाँ।

वक्त हैरान हिलती जड़ें बरगदी,
सब कहीं बादख़ल नीम की पत्तियाँ।

एक छल है गुलाबी फसल देश में,
दरअसल हैं असल नीम की पत्तियाँ।


पता
-सी-/५९ नागार्जुन नगर,
सादतपुर विस्तार,
दिल्ली-११००९४

-अनु जसरोटिया की ग़ज़ल-

धूप में मेरे साथ चलता था।
वो तो मेरा ही अपना साया था।

वो ज़माना भी कितना अच्छा था,
मिलना-जुलना था आना-जाना था।

यक-बयक माँ की आँख भर आई,
हाल बेटे ने उसका पूछा था।

दिल मचलता है चाँद की खातिर,
ऐसा नादां भी इसको होना था।

उसको आना था ऐसे वक्त कि जब,
कोई ग़फ़लत की नींद सोता था।

दिल है बेचैन उसके जाने पर,
बेवफाई ही उसका पेशा
था |

पता
-इन्दिरा कालोनी,
कठुआ-१८४१०१
[जम्मू और कश्मीर]

-दरवेश भारती की ग़ज़ल-

धन की लिप्सा ये रंग लायेगी।
आपसी फ़ासिले बढा़एगी।

तेरे जीवन का दम्भ टूटेगा,
ऐ ख़िज़ां जब बहार आएगी।

मुल्क में क्या बचेगा कुछ यारों,
बाड़ जब खुद ही खेत खाएगी।

इन उनींदे अनाथ बच्चों को,
लोरियाँ दे हवा सुलाएगी।

अणुबमों से सज गया संसार,
कैसे कुदरत इसे बचाएगी।

हम हैं ’दरवेश’ हमको ये दुनिया,
क्या रुलाएगी,क्या हँसाएगी।


पता-पोस्ट बाक्स न०-४५,
रोहतक -१२४००१[हरियाणा]
मोबाइल न०-०९२६८७९८९३०

-शिवकुमार ’पराग’ की ग़ज़ल-

ऐसी कविता प्यारे लिख।
जो मन को झंकारे लिख।

लौट के धरती पर आ जा,
अब ना चाँद सितारे लिख।

हवा-हवाई ही मत रह,
कुछ तो ठोस-करारे लिख।

पाला मार रहा सबको,
लिख,जलते अंगारे लिख।

दुरभिसंधियाँ फैल रहीं,
इनके वारे-न्यारे लिख।

समझौतों की रुत में भी,
खुद्दारी ललकारे लिख।

सिर पर है बाज़ार चढा़,
जो यह ज्वार उतारे लिख।

जहाँ-जहाँ अँधियारे हैं,
वहाँ-वहाँ उजियारे लिख।

हार-जीत जो हो सो हो,
लेकिन मन ना हारे लिख।

पता-म०न० /१४० एस-१०
संजय नगर[रमरेपुर],अकथा,
पहड़िया,वाराणसी[उ०प्र०]
मो०न०-९४१५६९४३६१


समकालीन ग़ज़ल

समकालीन ग़ज़ल,ग़ज़ल पर केन्द्रित एक प्रतिनिधि पत्रिका है जिसमें जून २००९ से हर माह अपने समय के सरोकारों से जुडी़ हुई रचनायें ही प्रकाशित होंगी। इसमें शामिल रचनाकारों के लिये ये जरूरी है कि वे रचनायें भेजते समय ग़ज़ल के शिल्प और छन्दानुशासन का पूरा ध्यान रखें।
सभी ग़ज़लकार मित्रों से यह आग्रह है कि वे अपनी उम्दा रचनायें ई मेल द्वारा - pbchaturvedi@in.com पर भेज सकते हैं|

नोट:-एक शायर स्तम्भ में एक ही ग़ज़लकार की कई रचनायें हर माह प्रकाशित होंगी। इसमें शामिल होने के लिये ये आवश्यक है कि ग़ज़लकार अपनी दस मौलिक रचनाओं के साथ अपना एक फ़ोटो एवं संक्षिप्त जीवन परिचय अवश्य प्रेषित करें।
फ़ुलवारी स्तम्भ में कई ग़ज़लकारों की एक-एक रचना प्रकाशित होंगी।
चुनिन्दा शेर स्तम्भ में चुने हुए कुछ ऐसे शेर प्रकाशित होंगे,जो अपने आप में पूर्ण होंगे।

विभिन्न शायरों के कुछ चुनिन्दा शेर-

१-विज्ञान व्रत -
मैं कुछ बेहतर ढूढ़ रहा हूँ।
घर में हूँ घर ढूढ़ रहा हूँ।


२-अश्वघोष-
मुझमें एक डगर ज़िन्दा है।
यानी एक सफ़र ज़िन्दा है।


३-ज्ञान प्रकाश विवेक-
किसी के तंज़ का देता न था जवाब मगर,
ग़रीब आदमी दिल में मलाल रखता था।


४-जयकृष्ण राय’तुषार’-
भँवर में घूमती कश्ती के हम ऐसे मुसाफ़िर हैं,
न हम इस पार आते हैं न हम उस पार जाते हैं।


५-बालस्वरूप राही-
सीधे-सच्चे लोगों के दम पर ही दुनिया चलती है,
हम कैसे इस बात को मानें कहने को संसार कहे।


Saturday, May 16, 2009

गीत/प्रसन्नवदन चतुर्वेदी/वैसे तो दुनिया में अक्सर

वैसे तो दुनिया में अक्सर,सूरत की कीमत होती है।
लेकिन सबसे अच्छी सूरत,इन्सान की सीरत होती है।


कभी तन सुन्दर मिल जाता है तो मन सुन्दर ये नहीं होता,
कभी मन सुन्दर जो होता है तो तन सुन्दर ये नहीं होता,
झूठी ये बात नहीं अक्सर, ये बात हकीकत होती है........
हाँ हाँ सबसे अच्छी सूरत,इन्सान की सीरत होती है........


शोहरत भी मिलती है जो अगर मन के ही अच्छे होने से,
सच्ची खुशियाँ भी मिलती हैं मन के ही सच्चे होने से,
दौलत दुनिया की सबसे बड़ी मन की ये मिल्कियत होती है..
सबसे अच्छी सूरत यारों इन्सान की सीरत होती है...........


जीवन अच्छा जो बिताना हो औरों को कभी न सताना तुम,
हो सके तो खुद पर भी हंसकर औरों को खूब हँसाना तुम,
जीवन अच्छा कट जाता है जब अच्छी नीयत होती है.....
अच्छी सबसे अच्छी सूरत,इन्सान की सीरत होती है.........

Thursday, May 14, 2009

सबसे प्यारा है महबूब का गम

शहर से बाहर होने के कारण मैं ४-५ दिन विलम्ब से आप को नई रचना दे रहा हूँ।आशा है आप इस देर को माफ़ करेंगे......

सबसे प्यारा है ये महबूब का ग़म।
सबसे न्यारा है ये महबूब का ग़म।


ग़म की दुनिया का इक चमकता हुआ,
इक सितारा है ये महबूब का ग़म।


जिन्दगी ये वीरान जीने को,
इक सहारा है ये महबूब का ग़म।


और सब ग़म तो भंवर जैसे हैं,
बस किनारा है ये महबूब का ग़म।


और कुछ भी मुझे गंवारा नहीं,
बस गंवारा है ये महबूब का ग़म।


सारी दुनिया चलो तुम्हारी है,
जो हमारा है ये महबूब का ग़म।

Monday, May 4, 2009

बनारस के शायर/मेयार सनेही


मैं इस ब्लाग का शुभारम्भ बनारस के जाने माने मशहूर शायर ज़नाब "मेयार सनेही"जी से कर रहा हूँ। इनका जन्म ०७-०३-१९३६ में हुआ। बनारस के कवि सम्मेलनों, कवि गोष्ठियों और मुशायरों को अपने शेरों से आप एक नई ऊँचाई प्रदान करते हैं । आप की ग़ज़लें,नज़्म विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में समय समय पर छपती आ रही हैं और आप की १९८४ में एक नज़्म की पुस्तक "वतन के नाम पाँच फ़ूल" भी प्रकाशित हो चुकी है। लगभग ४० सालों से आप साहित्य सर्जना में लगे हैं और ये क्रम अभी जारी है।
निवास-एस.७/९बी,गोलघर कचहरी,वाराणसी।
सम्पर्कसूत्र-९९३५५२८६८३



तो लीजीए उनकी ग़ज़लों का आनन्द........

1. ग़ज़ल/ कैसे वो पह्चाने ग़म :-

कैसे वो पह्चाने ग़म ।
पत्थर है क्या जाने ग़म।


दुनिया मे जो आता है,
आता है अपनाने ग़म।

नये गीत लिखवाने को,
आये किसी बहाने ग़म।

जब तक मेरी साँस चली,
बैठे रहे सिरहाने ग़म।

मैनें सोचा था कुछ और,
ले आये मयख़ाने ग़म।

जिसको अपना होश नहीं,
उसको क्या गरदाने ग़म।

दिल सबका बहलाते हैं,
जैसे हों अफ़साने ग़म।

क्या कहिये ’मेयार’ उसे,
जो खुशियों को माने ग़म।

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2. ग़ज़ल/ मोहब्बत की नुमाइश चल रही है :-

मोहब्बत की नुमाइश चल रही है।
मगर परदे में साजिश चल रही है।


वो बातें जिनसे मैं जख़्मी हुआ था,
अब उन बातों में पालिश चल रही है।

वो इक सजदा जो मुझसे हो न पाया,
उसी को लेके रंजिश चल रही है।

वो देखो जिन्दगी ठहरी हुई है,
मगर जीने की ख़्वाहिश चल रही है।

कोई ’मेयार’ होगा जिसकी खातिर,
सिफ़ारिश पर सिफ़ारिश चल रही है।

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3.ग़ज़ल/मेयार सनेही/कौन बे-ऐब है पारसा कौन है :-

कौन बे-ऐब है पारसा कौन है ?
किसको पूजे यहाँ देवता कौन है ?


जब चलन में है दोनों तो क्या पूछना,
कौन खोटा है इनमें खरा कौन है ?

ज़हर देता रहे औ’ मसीहा लगे,
आप जैसा यहाँ दूसरा कौन है?

रूप है इल्म है सौ हुनर हैं मगर,
ऐसी चीजों को अब पूछता कौन है?

अन्न उपजाने वाला मरा भूख से,
इस मुक़द्दर का आख़िर ख़ुदा कौन है ?

कौन ’मेयार’है यह नहीं है सवाल,
ये बताएँ कि वो आपका कौन है ?

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4. ग़ज़ल/ हसीं भी है मोहब्बत की अदाकारी :-

हसीं भी है मोहब्बत की अदाकारी भी रखता है।
मगर उससे कोई पूछे वफ़ादारी भी रखता है ।


इलाजे-जख़्मे-दिल की वो तलबगारी भी रखता है,
नये जख़्मों की लेकिन पूरी तैयारी भी रखता है।

इक ऐसा शख्स मेरी ज़िन्दगी में हो गया दाख़िल,
जो मुझको चाहता है मुझसे बेज़ारी भी रखता है।

वो मत्था टेकता है गिड़गिड़ाता है कि कुछ दे दो,
फ़िर उसके बाद ये दावा कि खुद्दारी भी रखता है।

वही है आजकल का बागबाँ जो हाथ में अपने,
दरख़्तों की कटाई के लिये आरी भी रखता है।

ख़ुदा के नाम पर भी तुम उसे बहका नहीं सकते,
वो दीवाना सही लेकिन समझदारी भी रखता है।

तुम उसके नर्म लहजे पर न जाओ ऐ जहाँ वालों,
वो है ’मेयार’ जो लफ़्जों में चिनगारी भी रखता है।
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मेयार सनेही जी ने नये-नये रदीफ़ और काफ़िया को लेकर कई ग़ज़लें कही हैं जैसे इस ग़ज़ल में.........

5. ग़ज़ल/ इक गीत लिखने बैठा था :-

इक गीत लिखने बैठा था मैं कल पलाश का।
ये बात सुन के हँस पडा़ जंगल पलाश का ।


साखू को बे-लिबास जो देखा तो शर्म से,
धरती ने सर पे रख लिया आँचल पलाश का।

रितुराज के ख़याल में गुम होके वन-परी,
कब से बिछाये बैठी है मख़मल पलाश का।

सूरज को भी चराग़ दिखने लगा है अब,
बढ़ता ही जा रहा है मनोबल पलाश का।

रंगे-हयात है कि है मौसम का ये लहू,
या फ़िर किसी ने दिल किया घायल पलाश का।

तनहा सफ़र था राह के मंजर भी थे उदास,
अच्छा हुआ कि मिल गया संबल पलाश का।

’मेयार’ इन्कलाब का परचम लिये हुए,
उतरा है आसमान से ये दल पलाश का।


Sunday, May 3, 2009

गीत/प्रसन्नवदन चतुर्वेदी/कुछ हमसे सुनो कुछ....

कुछ हमसे सुनो कुछ हमसे कहो।
चाँदनी रात है, ऐसे चुप ना रहो।


बडी़ मुश्किल से फ़ुरसत के पल आते हैं,
होके चुप इन पलों को न जाया करो;
प्यार के इस समुन्दर में आओ बहो......
चाँदनी रात है, ऐसे चुप ना रहो............


हर जगह भीड़ है हर जगह लोग हैं,
ऐसी तनहाई मिलती है जल्दी नहीं;
जहाँ कोई न हो जहाँ कोई न हो........
चाँदनी रात है, ऐसे चुप ना रहो............


लब अगर बात करने से कतरा रहे,
बात करने की तरकीब यूं सीख लो;
अपनी नज़रों से मेरी नज़र में कहो......
चाँदनी रात है, ऐसे चुप ना रहो............

तू मुझको याद रखना,मेरी बात याद रखना

तू मुझको याद रखना,मेरी बात याद रखना।
गुजरे जो खूबसूरत , लम्हात याद रखना।


बादल बरसने वाले ,आँखों में जब भी छाए;
मेरे साथ भींगने की,बरसात याद रखना।


तुमसे जुदा हो जाऊं,मैं कब ये चाहता था;
काबू में नहीं होते ,हालात याद रखना।


ग़मगीन तुम न होना,कभी इन जुदाइयों से;
मैं हूँ तुम्हारे दिल में तेरे साथ याद रखना।


नहीं आ सकूंगा मैं तो,तेरे पास ग़म न करना,
तू अपने मुहब्बत की, सौगात याद रखना।


मेंहदी लगी न तुझको,सेहरा न मैंने बाँधा;
तो क्या हुआ यादों की,बारात याद रखना।