Saturday, December 19, 2009

जब भी सोचूँ अच्छा सोचूँ

जब भी सोचूँ अच्छा सोचूँ।
मैं तो केवल इतना सोचूँ।

बालिग होकर ये मुश्किल है,
आओ खुद को बच्चा सोचूँ।


सोच रहे हैं सब पैसों की,
लेकिन मैं तो दिल का सोचूँ।

बातों की तलवार चलाए,
कैसे उसको अपना सोचूँ।

ऊपर वाला भी कुछ सोचे,
मैं ही क्योंकर अपना सोचूँ।


जो भी होगा अच्छा होगा,
मैं बस क्या है करना सोचूँ।

Saturday, November 28, 2009

प्यार तब और बढ़ा

मित्रों!अपने तीन ब्लाग मेरी गज़लें,मेरे गीत और रोमांटिक रचनायें को इस एक ही ब्लाग में समेटने के बाद मैंने रोमांटिक रचनायें कम ही पोस्ट की है । इस बार एक गीत प्रस्तुत है-


प्यार तब और बढ़ा और बढ़ा और बढ़ा,
जब लगाये गये पहरे प्यार के ऊपर.....

कोई अनारकली दीवार में चुनवाई गई,
कोई लैला कहीं यूं ही तड़पाई गई,
यूं सरेआम जमाने में रुसवाई हुई,
सितम जो ढाए गए कर सके कोई असर...
प्यार तब और बढ़ा और बढ़ा और बढ़ा.....

कहीं पे कैस कोई प्यार में दीवाना हुआ,
कहीं रांझा कोई हीर का निशाना हुआ,
और हर प्यार के खिलाफ़ ये जमाना हुआ,
मर गये इश्क के मारे ये सितम सह-सह कर...
प्यार तब और बढ़ा और बढ़ा और बढ़ा........

Wednesday, November 18, 2009

जीवन की एक महत्वपूर्ण यात्रा

आज आप को अपने जीवन की एक बहुत ही यादगार यात्रा का विवरण देना चाहूँगा।ये यात्रा मात्र नही है बल्कि एक तीर्थयात्रा है जो देश के हर नागरिक को अवश्य करनी चाहिये।यह यात्रा है अमर देशभक्त शहीद भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव की समाधि और हुसैनीवाला बार्डर पर भारत-पाक सीमा पर दोनों देशों की सेनाओं द्वारा किये जाने वाले परेड का।सबसे पहले मैं इस यात्रा के संयोजक और अपने अग्रज आदरणीय रमेश सचदेवा जी को बहुत-बहुत धन्यवाद देना चाहूँगा क्योंकि उनकी वजह से ही हम इस पवित्र धरती के दर्शन कर सके वरना हमारे लिये तो ये सपना ही रहता।हमारे साथ-साथ हरियाणा पब्लिक स्कूल मंडी डबवाली और शेरगढ़ के छात्र-छात्रायें भी थे और कुछ विशेष अतिथि भी।मैंने अपनी पत्नी,पुत्री और पुत्र के साथ यह यादगार यात्रा की.......
सबसे पहले हमने १९६५ के युद्ध में पाकिस्तान से जीत के बाद बरामद ये टैंक देखा[देखिये चित्र-१,२,३,४]।
अब पहले मैं इस जगह के बारे में बताना चाहूंगा........ [चित्र -५-२३]-
पंजाब के फीरोजपुर जिले में स्थित इस स्थान का ऐतिहासिक महत्व है।भगत सिंह,राजगुरु और सुखदेव को लाहौर में रातों-रात उनके शहीद होने के बाद अंग्रेजों ने उनके मृत शरीर को यहाँ लाकर मिट्टी का तेल छिड़ककर जला दिया।१९६५ में भारत-पाक युद्ध में पाक ने इस जगह कब्जा कर लिया और उनकी मुर्तियों आदि को पाकिस्तान लेकर चले गये।१९७१ के युद्ध में पराजित होने के बाद शिमला-समझौता के अन्तर्गत पुन: ये क्षेत्र भारत के पास आया। इन शहीदों की समाधि के साथ ही शहीद बटुकेश्वर दत्त की भी समाधि है क्योंकि उन्होनें अपनी मृत्यु के बाद यहीं पर अपनी समाधि की इच्छा प्रकट की थी।पास ही शहीद भगत सिंह की माता श्रीमती विदिया वती; जिन्हें १९७३ में पंजाब सरकार ने ‘पंजाब माता’ के खिताब से सम्मानित किया था और जिन्होनें इन शहीदों के साथ ही अपनी समाधि बनाने की इच्छा जताई थी;की समाधि भी उनके स्वर्गवास के बाद १९७४ में बनाई गई।
दर असल यह स्थल आजादी के पहले रेलवे स्टेशन था और लाहौर तक रेलवे मार्ग से जुड़ता था।इस पुराने रेलवे-स्टेशन की दीवारों पर १९६५ के भारत -पाक युद्ध के बीच गोलीबारी के साक्ष्य अब भी देखे जा सकते हैं।
चित्र-२४-२७ -[हुसैनीवाला बार्डर पर भारत-पाक सीमा पर दोनों देशों की सेनाओं द्वारा किये जाने वाला परेड]-यह भी एक रोचक और गौरवपूर्ण अनुभव था।दोनों ओर के सैनिकों के प्रदर्शन के समय नागरिक अपने-अपने देश के सैनिकों का उत्साहवर्द्धन कर रहे थे।कभी-कभी तो माहौल में वीर-रस का इतना प्रभाव हो जाता था कि हर कोई अपने को सैनिक अनुभव कर रहा था।वाह.....इस अनुभव को बस महसूस किया जा सकता है.....


















































Friday, October 30, 2009

यार नहीं जो काम न आए

बहुत दिनों बाद आज कोई रचना प्रस्तुत कर रहा हूँ..दरअसल मैं लगभग १ माह नेट से दूर रहा...आशा है आप को अवश्य पसंद आएगी ...

यार नहीं जो काम न आए।
प्यार वही जो साथ निभाए।

आता वक्त बुरा तो अक्सर,
जिससे आशा वो ठुकराए।

दिन में ही कुछ कोशिश कर लो,
जिससे काली रात न आए।

वक्त अगर बीतेगा ये भी,
दोबारा फिर हाथ न आए।

भाई-भाई अब लड़ते हैं,
आपस में ये बात न आए।

तू-तू,मैं-मैं करती दुनिया,
ऐसे तो हालात न आए।

सच पूछो तो वो ही जवां है,
जो मिट्टी का कर्ज़ चुकाए।

Sunday, September 27, 2009

जो है सच्ची वही खुशी रखिये

संभवत: ३०-०९-०९ को १५ दिनों के लिए दिल्ली जाना हो,इस कारण हो सकता है कि अगला पोस्ट वहीं से प्रस्तुत करुँ....तब तक ये ग़ज़ल प्रस्तुत है....

जो है सच्ची वही खुशी रखिए।
सीधी-सादी सी ज़िन्दगी रखिये ।

जो बुरे दिन में काम आते हों,
ऐसे लोगों से दोस्ती रखिए।

वक्त जब भी लगे अंधेरे में,
साथ यादों की रौशनी रखिए।

ग़म ये कहना सभी से ठीक नहीं,
राज अपना ये दिल में ही रखिए।

चीज कोई जो तुमको पानी हो,
चाहतों में दीवानगी रखिए।

दोस्ती दुश्मनी न बन जाये,
अपने काबू में दिल्लगी रखिए।

देवता आप मत बनें यारों,
आप अपने को आदमी रखिए।

लुत्फ़ तब दुश्मनी का आयेगा,
साथ कांटों के फूल भी रखिए।

Sunday, September 20, 2009

भजन/मन की बात समझने वाले

अब मैनें अपने सभी निजी ब्लागों जैसे ‘मेरी ग़ज़ल’,‘मेरे गीत’ और ‘रोमांटिक रचनाएं’ को एक ही ब्लाग मेरी ग़ज़लें,मेरे गीत/प्रसन्नवदन चतुर्वेदी'' में पिरो दिया है।दरअसल मैं चाहता हूँ कि आप मेरी हर रचना देंखें परन्तु सभी दर्शकगण और पाठक अलग-अलग ब्लाग्स पर सभी रचनाएं नहीं पढ़ पाते थे।मेरी ग़ज़ल’,‘मेरे गीत’ और ‘रोमांटिक रचनाएं’ के सभी अनुसरणकर्ता बन्धुओं और मित्रों से अनुरोध है कि वे मेरी ग़ज़ल’,‘मेरे गीत’ और ‘रोमांटिक रचनाएं’ पर से अनुसरण हटा लें और मेरे इस ब्लाग मेरी ग़ज़लें, मेरे गीत/प्रसन्नवदन चतुर्वेदी' का एक बार पुनः अनुसरण कर लें;असुविधा के लिये क्षमा प्रार्थी हूँ।नवरात्रि के शुभ अवसर पर एक भजन प्रस्तुत है....

मन की बात समझने वाले, तुमको भला मैं क्या बतलाऊँ।
मैं तो तेरे दर पे खडा़ हूँ, इच्छा पूरी कर दो जाऊँ।


मिट्टी का तन मैंने पाया,
मिट्टी को कंचन से सजाया,
ज्यादा खोया कम ही पाया,
इसी भरम में जन्म गंवाया,
बीत गई है उम्र ये जैसे,अब ना बाकी उम्र गंवाऊँ...


मंदिर में बस आये-जाये,
मन पर पाप का मैल चढा़ये,
भक्त ये प्रभु को भी बहकाये,
लड्डू-पेड़ों से बहलाये,
सारी सृष्टि रचने वाले,मैं क्या तुमको भोग लगाऊँ...

Sunday, September 13, 2009

कैसे कह दें प्यार नहीं है

अब कुछ प्यार की बात भी हो जाए...है न...

कैसे कह दें प्यार नहीं है।
हम पत्थरदिल यार नहीं हैं।

अपनी बस इतनी मजबूरी,
होता बस इज़हार नहीं है।

मिलने का कुछ कारण होगा,
ये मिलना बेकार नहीं है।

तुम मुझको अच्छे लगते हो,
अब इससे इनकार नहीं है।

कुछ लोगों से मन मिलता है,
इससे क्या गर यार नहीं हैं।

तुम फूलों सी नाजुक हो तो,
हम भौरें हैं खा़र नहीं है।

क्या मेरे दिल में रह लोगे,
बंगला,मोटरकार नहीं है।

तनहा-तनहा जीना मुश्किल,
संग तेरे दुश्वार नहीं है।

हुश्न की नैया डूबी-डूबी,
इश्क अगर पतवार नहीं है।

मैं तबतक साधू रहता हूँ,
जबतक आँखें चार नहीं हैं ।


कृपया बनारस के कवि/शायर,समकालीन ग़ज़ल [पत्रिका] में नई ग़ज़लें जरूर देंखे ...और टिप्पणी भी दें...

Sunday, September 6, 2009

ग़ज़ल/संजीदगी से गाओ ये गीत दर्द का है

अक्सर हम गायकों को गीत गाते हुए सुनते हैं|मुझे एक बार ख्याल आया की शायद कभी ऐसा भी होता होगा कि गीत तो दर्द भरा हो,पर गायक उसे हलके-फुल्के अंदाज़ में गाए जा रहा हो|जबकि उसे संजीदगी से वह गीत गाना चाहिए था|बस बन गई कुछ पंक्तियाँ --

संजीदगी से गाओ ये गीत दर्द का है
ऐसे मुस्कुराओ ये गीत दर्द का है

शायर का दर्द तेरी आवाज़ में भी उभरे,
ऐसी कशिश से गाओ ये गीत दर्द का है

गुजरा है ये तुम्हीं पर ऐसा लगे सभी को,
आँखों में अश्क लाओ ये गीत दर्द का है

जितने भी सुन रहे हों उस गम में डूब जायें,
कुछ यूँ समां बनाओ
ये गीत दर्द का है

जब लिख रहा था इसको रोया बहुत था दिल ये,
वो दर्द फिर जगाओ
ये गीत दर्द का है

वो सच्ची शायरी है दिल पर असर करे जो,
दिल में जगह बनाओ
ये गीत दर्द का है।

Sunday, August 30, 2009

बात करते हैं हम मुहब्बत की

बात करते हैं हम मुहब्बत की,और हम नफ़रतों में जीते हैं ।
खामियाँ गैर की बताते हैं ,खुद बुरी आदतों में जीते हैं ।

सबको आगे आगे जाना है,तेज रफ़्तार जिन्दगी की हुई;
भागते दौड़ते जमाने में, हम बडी़ फ़ुरसतों में जीते हैं ।

आज तो ग़म है बेबसी भी है,जिन्दगी कट रही है मुश्किल से;
आने वाला पल अच्छा होगा , हम इन्हीं हसरतों में जीते हैं ।

आज के दौर मे जीना है कठिन,और मरना बडा़ आसान हुआ;
कामयाबी बडी़ हमारी है , जो ऐसी हालतों में जीते हैं ।

मिट्टी लगती है जो भी चीज मिली,जो भी पाया नहीं वो सोना लगा; 
जो हमें चीज मिल नहीं सकती ,हम उन्हीं चाहतों में जीते हैं

कृपया बनारस के कवि/शायर, समकालीन ग़ज़ल [पत्रिका] में नई ग़ज़लें 
जरूर देंखे ... और टिप्पणी भी दें...

Friday, August 28, 2009

मुझे तनहाइयां भाती नहीं है

मुझे तनहाइयां भाती नहीं हैं। 
मैं तन्हा हूँ तू क्यों आती नहीं है।

तुझे ना देख लें जबतक ये नज़रें,
सुकूं पल भर भी ये पाती नहीं है।

गये हो दूर तुम जबसे यहाँ से,
बहारें भी यहाँ आती नहीं है।

तराने गूंजते थे कल तुम्हारे,
वहाँ कोयल भी अब गाती
नहीं है।

तुझे अपना बनाना चाहता था,
कसक दिल की अभी जाती
नहीं है।

शिकायत है यही किस्मत से अपने,
मुझे ये तुमसे मिलवाती
नहीं है।


कृपया बनारस के कवि/शाय,समकालीन ग़ज़ल [पत्रिका] में नई ग़ज़लें जरूर देंखे ...

Saturday, August 22, 2009

मंजिल को पाने की खातिर

मंजिल को पाने की खातिर , कोई राह बनानी होगी ।
दूर अंधेरे को करने को , कोई शमा जलानी होगी ।

अंगारों पर चलना होगा , काँटों पर सोना होगा ;
कितने ख्वाब तोड़ने होंगे , कितनी चाह मिटानी होगी ।

बस दो ही तो राहें अपने , इस जीवन में होती हैं ;
अच्छी राह चुनो तो अच्छा , बुरी राह नादानी होगी ।

इतना भी आसान नहीं है , मंजिल को यूँ पा लेना ;
कुछ पाने की खातिर तुमको , देनी कुछ कुर्बानी होगी।

लीक से हटकर चलना तो अच्छा है लेकिन मुश्किल है;
दिल का हौसला जारी रखोगे तो बड़ी आसानी होगी ।

पैदा होकर मर जाते हैं , जाने कितने लोग यहाँ ;
लेकिन नया करोगे कुछ तो , तेरी अमर कहानी होगी ।

दुनिया वाले कुछ बोलेंगे , जैसी उनकी आदत है;
लेकिन जब मंजिल पा लोगे , दुनिया पानी पानी होगी

Friday, August 21, 2009

बनारस में एक कवि गोष्ठी

दिनांक 20-08-09 को वाराणसी में नई दिल्ली से पधारे श्री अमित दहिया ‘बादशाह’,कुलदीप खन्ना,सुश्री शिखा खन्ना,विकास आदि की उपस्थिति में श्री उमाशंकर चतुर्वेदी‘कंचन’ के निवास स्थान पर एक काव्य-गोष्ठी का आयोजन हुआ जिसमें इनके और मेरे अतिरिक्त देवेन्द्र पाण्डेय,नागेश शाण्डिल्य,विन्ध्याचल पाण्डेय, ,शिवशंकर ‘बाबा’,अख्तर बनारसी आदि कवि मित्रों ने भाग लेकर काव्य-गोष्ठी को एक ऊचाँई प्रदान की।प्रस्तुत काव्य-गोष्ठी के कुछ चित्र मेरे ब्लॉग 'कुछ हमसे सुनो कुछ हमसे कहो' पर देंखे ....

कुलदीप खन्ना,देवेन्द्र पांडे,अमित दहिया'बादशाह' उमाशंकर चतुर्वेदी'कंचन'














शिखा खन्ना और विकास















उमाशंकर चतुर्वेदी'कंचन',विंध्याचल पाण्डेय,प्रसन्न वदन चतुर्वेदी और शिवशंकर 'बाबा'














शिखा खन्ना और विकास













































कुलदीप खन्ना,देवेन्द्र पांडे,














देवेन्द्र पांडे,अमित दहिया'बादशाह'















Friday, August 14, 2009

है कठिन इस जिंदगी के हादसों को

है कठिन इस जिंदगी के हादसों को रोकना ।
मुस्कराहट रोकना या आसुओं को रोकना ।

वक्त कैसा आएगा आगे न जाने ये कोई ,
इसलिए मुश्किल है शायद मुश्किलों को रोकना ।

मंजिलों की ओर जाने के लिए हैं रास्ते,
इसलिए मुमकिन नहीं है रास्तों को रोकना ।

इनको होना था तभी तो हो गए होते गए ,
चाहते तो हम भी थे इन फासलों को रोकना ।

दोस्तों के रूप में अक्सर छुपे रहते हैं ये,
इसलिये आसां नहीं है दुश्मनों को रोकना ।

भजन/दर्शन दो प्रभु कबसे खड़े हैं

आज श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के शुभ अवसर पर मैं अपना लिखा एक भजन प्रस्तुत कर रहा हूँ.....

दर्शन दो प्रभु कबसे खड़े हैं।
हम भारी विपदा में पड़े हैं।

कोई नहीं प्रभु-सा रखवाला,
मेरे कष्ट मिटाने वाला,
जीवन में कर दीजै उजाला;
आप दयालू नाथ बड़े हैं.......

झूठी माया झूठी काया,
लेकर मैं दुनिया में आया,
दुनिया में है पाप समाया;
भरते पाप के रोज़ घड़े हैं........

पाप हटे मिट जाये बुराई,
सबमें पडे़ प्रभु आप दिखाई,
इच्छाओं ने दौड़ लगाई;
कितनी गहरी मन की जड़े है.......

Sunday, July 26, 2009

गीत/मुझे याद आ रहे हैं,वो ज़िन्दगी के दिन

आज मैं एक ऐसा गीत यहाँ प्रस्तुत कर रहा हूँ जो कई मायनों में एकदम अलग है।इस गीत की खा़सियत यह है कि पूरे जीवन का वर्णन एक गीत में ही हो जाता है।है अनोखी बात!मुझे यकीन है कि आप को मेरा यह गीत जरूर पसन्द आयेगा क्योंकि यह आप के जीवन की कहानी भी तो बयां कर रहा है.........

मुझे याद आ रहे हैं ,वो ज़िन्दगी के दिन।
कुछ मेरे ग़म के दिन,कुछ मेरी खुशी के दिन।

बचपन के खेल सारे, नानी की वो कहानी;
ससुराल जो गई है, उस बहन की निशानी;
झगडा़ करना,रोना और फिर हसीं के दिन......

कुछ और बडा़ होना,कुछ और सोचना;
ख्वाबों में,खयालों में; आकाश चूमना;
आज़ाद हर तरह से, कुछ बेबसी के दिन......

गप-शप वो दोस्तों के,और हम भी उसमें शामिल,
वो शोर वो ठहाके,यारों की हसीं महफ़िल;
वो किताब-कापियों के,वो दिल्लगी के दिन.....

कुछ उम्र बढी़ और, नौजवान हम हुए;
कितनी ही हसीनों के,अरमान हम हुए;
जब सोच में तब्दीली हुई उस घडी़ के दिन.....

अब ख्वाब में आने लगे,जुल्फ़ों के वो साये;
फिर जो भी हुआ उसको,अब कैसे हम बतायें;
दीवाने हो गये हम,दीवानगी के दिन.....

फिर जैसे बहार आई,घर मेरा खिल गया;
बावस्ता उम्र भर के,इक दोस्त मिल गया;
फिर फूल कुछ खिले और, नई रौशनी के दिन.....

बच्चे बडे़ हुए अपनी उम्र बढ़ गई;
चेहरे पे झुर्रियों की,सौगात चढ़ गई;
हुए खत्म धीरे-धीरे,जीवन की लडी़ के दिन.....

चाहे जितना कष्ट उठा ले

आज अपनी एक ऐसी रचना यहाँ दे रहा हूँ जो वाराणसी के एक मशहूर गायक श्री चन्द्रशेखर चक्रवर्ती जी ने गायी है और यह रचना राग दुर्गा में उनके द्वारा निबद्ध की गयी है। इस ग़ज़ल का दूसरा शेर तथाकथित डान (अपराधी) के सन्दर्भ में तथा चौथा शेर भारतीय तथा पाश्चात्य संगीत के लिये है।आप सभी प्रबुद्धजन हैं ये अर्थ बताने की जरुरत नही है पर इच्छा हुई तो लिख दिया,आशा है आप इसके लिये नाराज़ नही होंगे।

चाहे जितना कष्ट उठा ले, अच्छाई-अच्छाई है।
खुल जाता है भेद एक दिन, सच्चाई-सच्चाई है।

होती है महसूस जरूरत, जीवन में इक साथी की,
तनहा जीवन कट नहीं सकता,तनहाई-तनहाई है।

चर्चे खूब हुए हैं तेरे,हर घर में हर महफ़िल में,
चाहे जितनी शोहरत पा ले, रुसवाई-रुसवाई है।

पूरे बदन को झटका देना,हाथों को ऊपर करके,
सच पूछो तो तेरी उम्र की, अँगडा़ई-अँगडा़ई है।

पश्चिम की पूरजोर हवा से,पैर थिरकने लगते हैं,
झूम उठता है सिर मस्ती में, पुरवाई-पुरवाई है।

भाषा अलग अलग पहनावा,अलग अलग हम रहतें हैं,
लेकिन हम सब हिन्दुस्तानी, भाई-भाई-भाई हैं।

गम़ में खुशी में एक सा रहना,जैसे एक सी रहती है;
सुख-दुख दोनों में बजती है, शहनाई-शहनाई है।

Sunday, July 12, 2009

दिल का कहना जरूर माना करो

दिल का कहना जरूर माना करो।
ख़ुद को ख़ुद से ख़फ़ा किया ना करो।

चीज कोई जो तुमको पानी है ,
ख़ुद को उसके लिए दीवाना करो।

जब भला तुम किसी का कर न सको ,
तुम किसी का कभी बुरा ना करो।

आजमाते रहे हो जीवन भर,
बन्द अब ख़ुद को आजमाना करो।

झूठी तारीफ़ रूबरू जो करे,
उसको हमदर्द तुम न माना करो।

तुममें भी इक खु़दा तो रहता है,
तुम हमेशा खु़दा-खु़दा ना करो।

गीत/भूलने वाले मुझे याद कर

भूलने वाले मुझे याद कर,भूलने वाले मुझे याद आ।
आ खयालों में मेरे तू आ,मुझको अपने खयालों में ला।

ये तनहाई है मेरी दुश्मन, ये तो तुमको भी सताती होगी;
मैं इधर जब तड़पता हूँ इतना,ये तुम्हें भी तड़पाती होगी;
पास आ तू मेरे पास आ,और तनहाइयों को भगा........

अब है तुमको मेरी जरूरत, और तू है जरूरत मेरी;
मैं हूँ तेरे हाथ की लकीरें,और तू ही है किस्मत मेरी;
हाथ में हाथ आ तू रख दे और दोनों की किस्मत जगा......

मन से मन तो मिल ही चुके हैं,तन से तन भी आकर मिला ले;
ये मुहब्बत की दुनिया हो रौशन,ऐसी शम्मा तू आकर जला ले;

ये शरम, ये हया छोड़कर;मुझको अपने गले तू लगा..........

आप दिल की जुबां समझते हैं

आप दिल की जुबां समझते हैं।
फिर भी अनजान बन के रहते हैं।

खूब मालूम आप को ये है,
हम यहाँ किससे प्यार करते हैं।

है ये दस्तूर ले के देने का,
दिल मेरा ले के अब मुकरते हैं।

मुझको मालूम है अकेले में,
आप मेरे लिए सुबकते हैं।

हर हसीं को गुमा ये होता है,
लोग सारे ये मुझपे मरते हैं।

उनको देखें नहीं भला क्यों जब,
इतना मेरे लिये संवरते हैं।

दूसरा जब भी आप को देखे,
जख्म दिल मे नयें उभरते हैं।

हुश्न में कुछ न कुछ तो है यारों,
इसपे इक बार सब फिसलते हैं।

छुप के देखा है मुझे तुमने भी,
जैसे हम रोज़-रोज़ करते हैं।

कीजिए खुल के कीजिए इकरार,
कितने इसके लिए तरसते हैं।

मैनें देखा है पूरी दुनिया में,
लोग छुप-छुप के प्यार करते हैं।

वो जवां जबसे, है नज़र सबकी,
क्यूं ,कहाँ,कैसे,कब गुजरते हैं।

हुश्न वालों को शर्म आती नहीं,
इश्क वाले ही अब झिझकते हैं

Sunday, July 5, 2009

बडी़ मुश्किल है बोलो क्या बताएं

एक नई ग़ज़ल ["मुफ़ाईलुन मुफ़ाईलुन फ़ऊलुन"पर आधारित] प्रस्तुत कर रहा हूँ...

बड़ी
मुश्किल है बोलो क्या बताएं

पूछो कैसे हम जीवन बिताएं।

अदाकारी हमें आती नही है,
ग़मों में कैसे अब हम मुस्कुराएं।

अँधेरा ऐसा है दिखता नही कुछ,
चिरागों को जलाएं या बुझाएं।

फ़रेबों,जालसाजी का हुनर ये,
भला खुद को ही हम कैसे सिखाएं।

ये माना मुश्किलों की ये घडी़ है,
चलो उम्मीद हम फिर भी लगाएं।

सियासत अब यही तो रह गई है,
विरोधी को चलो नीचा दिखाएं।

अगर सच बोल दें तो सब खफ़ा हों,
बनें झूठा तो अपना दिल दुखाएं।

दूर रहकर भी मेरे पास हो तुम

दूर रहकर भी मेरे पास हो तुम।
जिसको ढूंढू वही तलाश हो तुम।

प्यार जो पहली-पहली बार हुआ,
मेरे उस प्यार का अह्सास हो तुम।

इस जहाँ में बहुत से चेहरे हैं,
इन सभी में बहुत ही खास हो तुम।

तेरा-मेरा मिलन तो फिर होगा,
ऐ मेरे यार क्यों उदास हो तुम।

तुमसे ही मेरी हर तमन्ना है,
मेरी हसरत हो मेरी आस हो तुम।

Tuesday, June 30, 2009

पास आओ तो बात बन जाए

कई दिनों बाद इस ब्लाग पर कोई रचना प्रस्तुत कर रहा हूँ।देर की वजह कुछ तो "समकालीन ग़ज़ल [पत्रिका] ","बनारस के कवि/शायर "में व्यस्तता थी;कुछ मौसम का भी असर था।दरअसल गर्म मौसम में नेट पर बैठने का मन नहीं करता ; परन्तु अब नई रचनाएँ पोस्ट कर रहा हूँ , आशा है आप का स्नेह हर रचना को मिलेगा ... यहाँ इस रचना के साथ मैं पुनः उपस्थित हूँ-

पास आओ तो बात बन जाए।
दिल मिलाओ तो बात बन जाए।

बात गम से अगर बिगड़ जाए,
मुस्कुराओ तो बात बन जाए।

बीच तेरे मेरे जुदाई है,
याद आओ तो बात बन जाए।

तुमको देखा नहीं कई दिन से,
आ भी जाओ तो बात बन जाए।

साथ मेरे वही मुहब्बत का,
गीत गाओ तो बात बन जाए।

नफरतों से फ़िजा बिगड़ती है ,
दिल लगाओ तो बात बन जाए।

गीत/ हर रोज़ कुआँ खोदना

हर रोज़ कुआँ खोदना फ़िर प्यास बुझाना ,
ये ज़िन्दगी है ज़िन्दगी या एक सजा है।
जाना जहाँ से फिर वही वापस भी लौटना,
ये ज़िन्दगी है ज़िन्दगी या एक सजा है।

ज्यूं हर खुशी के घर का पता भूल गया हूँ,
मैं मुद्दतों से खुल के हंसना भूल गया हूँ,
रोना,तरसना छोटी-छोटी चीज के लिए,
ये ज़िन्दगी है ज़िन्दगी या एक सजा है।

हर सुबह को जाते हैं और शाम को आते,
हर रोज़ एक जैसा वक्त हम तो बिताते,
जीवन में नया कुछ नहीं इक बोझ सा ढोना,
ये ज़िन्दगी है ज़िन्दगी या एक सजा है।

बस पेट के लिये ही जिए जा रहे हैं हम,
कुछ और नहीं कर सके इस बात का है ग़म,
कुछ दे सके हम नया तो खुद ही सोचना,
ये ज़िन्दगी है ज़िन्दगी या एक सजा है।

Monday, June 22, 2009

तीन ग़ज़लें /प्रसन्न वदन चतुर्वेदी

"आज की ग़ज़ल" में द्विजेन्द्र ’द्विज’ की एक ग़ज़ल की पंक्ति-"सात समन्दर पार का सपना सपना ही रह जाता है" पर आधारित ग़ज़ल लिखने की प्रतियोगिता हो रही है,मैं उसी बहर में उसी ग़ज़ल पर आधारित ये तीन ग़ज़लें प्रस्तुत कर रहा हूँ ,ये ग़ज़लें कैसी हैं ये आपको तय करना है.........

मुफलिस के संसार का सपना सपना ही रह जाता है।
बंगला,मोटरकार का सपना सपना ही रह जाता है।

रोटी-दाल में खर्च हुई है उमर हमारी ये सारी,
इससे इतर विचार का सपना सपना ही रह जाता है।

गाँवों से तो लोग हमेशा शहरों में आ जाते हैं,
सात समन्दर पार का सपना सपना ही रह जाता है।

कोल्हू के बैलों के जैसे लोग शहर में जुतते हैं,
फ़ुरसत के व्यवहार का सपना सपना ही रह जाता है।

बिक जाते हैं खेत-बगीचे शहरों में बसते-बसते,
वापस उस आधार का सपना सपना ही रह जाता है।

पैसा तो मिलता है सात समुन्दर पार के देशों में,
लेकिन सच्चे प्यार का सपना सपना ही रह जाता है।

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सात समुन्दर पार का सपना सपना ही रह जाता है।
आखिर में तो हासिल सिर्फ़ तड़पना ही रह जाता है।

बाग-बगीचे बिकते-बिकते कंगाली आ जाती है,
लेके कटोरा नाम प्रभु का जपना ही रह जाता है।

सोच समझकर काम किया तो सब अच्छा होगा वरना,
आखिर में बस रोना और कलपना ही रह जाता है।

दौलत खत्म हुई तो कोई साथ नहीं फिर देता है,
पूरी दुनिया में तनहा दिल अपना ही रह जाता है।

रोज़ किताबें लिखते हैं वो क्या लिखते मालूम नहीं,
कैसे लेखक जिनका मक़सद छपना ही रह जाता है।

ऊँचे-ऊँचे पद पर बैठे अधिकारी और ये मंत्री,
लक्ष्य कहो क्यों उनका सिर्फ हड़पना ही रह जाता है।

दुख से उबर जाऊँगा लेकिन प्रश्न मुझे ये मथता है,
सोने की किस्मत में क्योंकर तपना ही रह जाता है।

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पूरे जीवन इंसा अच्छे काम से शोहरत पाता है।
भूल अगर इक हो जाये तो पल में नाम गँवाता है।

खूब कबूतरबाज़ी होती बिक जाते हैं घर फिर भी,
सात समुन्दर पार का सपना सपना ही रह जाता है।

गाँव-शहर से हटकर जो परदेश चला जाता है वो,
अपने मिट्टी की खुशबू की यादें भी ले जाता है।

आइस-बाइस,ओक्का-बोक्का,ओल्हा-पाती भूल गये,
शहरों में अब बचपन को बस बल्ला-गेंद ही भाता है।

पेड़ जड़ों से कट जाये तो कैसे फल दे सकता है,
बस इन्सान यँहा है ऐसा,ऐसा भी कर जाता है।

Monday, June 8, 2009

तेरी नाराज़गी का क्या कहना

तेरी नाराज़गी का क्या कहना ।
अपनी दीवानगी का क्या कहना ।

कट रही है तुझे मनाने में,
मेरी इस जिंदगी का क्या कहना ।

तेरी गलियों की खाक छान रहा,
मेरी आवारगी का क्या कहना ।

तेरी मुस्कान से भरी महफ़िल,
मेरी वीरानगी का क्या कहना ।

जान पर मेरे बन गई लेकिन,
तेरी इस दिल्लगी का क्या कहना ।

इतनी आसानी से मना करना,
तेरी इस सादगी का क्या कहना ।

कोशिशें सब मेरी हुयी जाया,
ऐसी बेचारगी का क्या कहना ।

आंधियाँ भी चले और दिया भी जले

आज मैं अपनी वह रचना आप के लिये प्रस्तुत कर रहा हूँ जिसे राग यमन में श्रीमती अर्चना शाही ने अपनी आवाज़ दी थी...आशा है आप इसे अवश्य पसन्द करेंगे.....

आंधियाँ भी चले और दिया भी जले ।
होगा कैसे भला आसमां के तले ।

अब भरोसा करें भी तो किस पर करें,
अब तो अपना ही साया हमें ही छले ।

दिन में आदर्श की बात हमसे करे,
वो बने भेड़िया ख़ुद जंहा दिन ढले ।

आवरण सा चढ़ा है सभी पर कोई,
और भीतर से सारे हुए खोखले ।

ज़िन्दगी की खुशी बांटने से बढ़े ,
तो सभी के दिलों में हैं क्यों फासले ।

कुछ बुरा कुछ भला है सभी को मिला ,
दूसरे की कोई बात फ़िर क्यों खले ।

Sunday, May 31, 2009

अब किसी पर नहीं रह गया ऐतबार

अब किसी पर नहीं रह गया ऐतबार,
जो भी मेरे थे मुझको न मेरे लगे |
मुझको अपनों ने लूटा बहुत इस कदर,
दोस्त भी जो मिले तो लुटेरे लग |

गैर हो तो मैं शिकवा शिकायत करूँ,
अब मैं अपनों की कैसे खिलाफत करूँ,
जब कभी कहना चाहा कोई बात तो,
रोकने के लिए कितने घेरे लगे |

रात जाने लगी फ़िर सवेरा हुआ,
दूर फ़िर भी न मन का अँधेरा हुआ,
रौशनी ने दिए इतने धोखे मुझे,
ये उजाले भी मुझको अंधेरे लगे |

Saturday, May 30, 2009

मुहब्बत है मुहब्बत है मुझे तुमसे मुहब्बत है।

मुहब्बत है मुहब्बत है मुझे तुमसे मुहब्बत है।
जरुरत है जरुरत है मुझे तेरी जरुरत है |

है गोरा रंग तेरा काली आँखें सुर्ख लब तेरे,
कि चाहत है हाँ चाहत है मुझे इनकी ही चाहत है।

तुम इतनी खूबसूरत हो कि हर तारीफ़ कम होगी,
कयामत है कयामत है हुश्न तेरा कयामत है ।

खुदाई इश्क है तेरा और तू है खुदा मेरी,
इबादत है इबादत है इश्क मेरा इबादत है।

मुझे भी देख लेते हो कभी तुम अपनी आँखों से,
इनायत है इनायत है तुम्हारी ये इनायत है।

तसव्वुर में तुम्हें लाता हूँ तो मुझको ऐसा लगता है,
जियारत है जियारत है यही तेरी जियारत है।

ये मेरा दिल लो तुम ले लो जैसे चाहो इस से खेलो,
इजाज़त है इजाज़त है तुम्हें इसकी इजाज़त है।

सच बताया ये दोष मेरा था।

सच बताया ये दोष मेरा था।
ग़म उठाया ये दोष मेरा था।

दर्द से रोना चाहिये था मुझे,
मुस्कुराया ये दोष मेरा था।

सर झुकाना नहीं था मुझको जहाँ,
सर झुकाया ये दोष मेरा था।

टूटनेवाली दोस्ती के लिये,
सब लुटाया ये दोष मेरा था।

नफ़रतों का जहान है फ़िर भी,
दिल लगाया ये दोष मेरा था।

दोस्तों के भी दुश्मनों के भी,
काम आया ये दोष मेरा था।

Saturday, May 16, 2009

गीत/प्रसन्नवदन चतुर्वेदी/वैसे तो दुनिया में अक्सर

वैसे तो दुनिया में अक्सर,सूरत की कीमत होती है।
लेकिन सबसे अच्छी सूरत,इन्सान की सीरत होती है।


कभी तन सुन्दर मिल जाता है तो मन सुन्दर ये नहीं होता,
कभी मन सुन्दर जो होता है तो तन सुन्दर ये नहीं होता,
झूठी ये बात नहीं अक्सर, ये बात हकीकत होती है........
हाँ हाँ सबसे अच्छी सूरत,इन्सान की सीरत होती है........


शोहरत भी मिलती है जो अगर मन के ही अच्छे होने से,
सच्ची खुशियाँ भी मिलती हैं मन के ही सच्चे होने से,
दौलत दुनिया की सबसे बड़ी मन की ये मिल्कियत होती है..
सबसे अच्छी सूरत यारों इन्सान की सीरत होती है...........


जीवन अच्छा जो बिताना हो औरों को कभी न सताना तुम,
हो सके तो खुद पर भी हंसकर औरों को खूब हँसाना तुम,
जीवन अच्छा कट जाता है जब अच्छी नीयत होती है.....
अच्छी सबसे अच्छी सूरत,इन्सान की सीरत होती है.........

Thursday, May 14, 2009

सबसे प्यारा है महबूब का गम

शहर से बाहर होने के कारण मैं ४-५ दिन विलम्ब से आप को नई रचना दे रहा हूँ।आशा है आप इस देर को माफ़ करेंगे......

सबसे प्यारा है ये महबूब का ग़म।
सबसे न्यारा है ये महबूब का ग़म।


ग़म की दुनिया का इक चमकता हुआ,
इक सितारा है ये महबूब का ग़म।


जिन्दगी ये वीरान जीने को,
इक सहारा है ये महबूब का ग़म।


और सब ग़म तो भंवर जैसे हैं,
बस किनारा है ये महबूब का ग़म।


और कुछ भी मुझे गंवारा नहीं,
बस गंवारा है ये महबूब का ग़म।


सारी दुनिया चलो तुम्हारी है,
जो हमारा है ये महबूब का ग़म।

Sunday, May 3, 2009

गीत/प्रसन्नवदन चतुर्वेदी/कुछ हमसे सुनो कुछ....

कुछ हमसे सुनो कुछ हमसे कहो।
चाँदनी रात है, ऐसे चुप ना रहो।


बडी़ मुश्किल से फ़ुरसत के पल आते हैं,
होके चुप इन पलों को न जाया करो;
प्यार के इस समुन्दर में आओ बहो......
चाँदनी रात है, ऐसे चुप ना रहो............


हर जगह भीड़ है हर जगह लोग हैं,
ऐसी तनहाई मिलती है जल्दी नहीं;
जहाँ कोई न हो जहाँ कोई न हो........
चाँदनी रात है, ऐसे चुप ना रहो............


लब अगर बात करने से कतरा रहे,
बात करने की तरकीब यूं सीख लो;
अपनी नज़रों से मेरी नज़र में कहो......
चाँदनी रात है, ऐसे चुप ना रहो............

तू मुझको याद रखना,मेरी बात याद रखना

तू मुझको याद रखना,मेरी बात याद रखना।
गुजरे जो खूबसूरत , लम्हात याद रखना।


बादल बरसने वाले ,आँखों में जब भी छाए;
मेरे साथ भींगने की,बरसात याद रखना।


तुमसे जुदा हो जाऊं,मैं कब ये चाहता था;
काबू में नहीं होते ,हालात याद रखना।


ग़मगीन तुम न होना,कभी इन जुदाइयों से;
मैं हूँ तुम्हारे दिल में तेरे साथ याद रखना।


नहीं आ सकूंगा मैं तो,तेरे पास ग़म न करना,
तू अपने मुहब्बत की, सौगात याद रखना।


मेंहदी लगी न तुझको,सेहरा न मैंने बाँधा;
तो क्या हुआ यादों की,बारात याद रखना।

Sunday, April 26, 2009

आप की जब थी जरूरत आप ने धोखा दिया

आप की जब थी जरूरत, आप ने धोखा दिया।
हो गई रूसवा मुहब्बत , आप ने धोखा दिया।


बेवफ़ा होते हैं अक्सर, हुश्नवाले ये सभी;
जिन्दगी ने ली नसीहत, आप ने धोखा दिया।


खुद से ज्यादा आप पर मुझको भरोसा था कभी;
झूठ लगती है हकीकत, आप ने धोखा दिया।


दिल मे रहकर आप का ये दिल हमारा तोड़ना;
हम करें किससे शिकायत,आप ने धोखा दिया।


पार करने वाला माझी खुद डुबाने क्यों लगा;
कर अमानत में खयानत,आप ने धोखा दिया।

हास्यगीत/जोरू का गुलाम

भयवश नहीं परिस्थितिवश मैं करता हूँ सब काम।
फ़िर भी लोग मुझे कहते हैं जोरू का गुलाम.......।

सुबह अगर बीबी सोई हो, चाय बनाना ही होगा;
बनी चाय जब पीने को तब उसे जगाना ही होगा;
चाय बनाना शौक है मेरा हो सुबह या शाम.......
फ़िर भी लोग मुझे कहते हैं जोरू का गुलाम.......।

मूड नहीं अच्छा बीबी का फ़िर पति का फ़र्ज है क्या;
बना ही लेंगे खाना भी हम आखिर इसमें हर्ज है क्या;
इसी तरह अपनी बीबी को देता हूँ आराम.....
फ़िर भी लोग मुझे कहते हैं जोरू का गुलाम.......।

वो मेरी अर्धांगिनी है इसमें कोई क्या शक है;
इसीलिये तनख्वाह पे मेरे केवल उसका ही हक है;
मेरा काम कमाना है बस खर्चा उसका काम.....
फ़िर भी लोग मुझे कहते हैं जोरू का गुलाम.......।

Monday, April 20, 2009

गीत/प्रसन्नवदन चतुर्वेदी/मैं क्यूँ औरो के गीत लिखूं

ये गीत आप के सामने प्रस्तुत है जो मुझे बहुत प्रिय है ,देंखू आप को कैसा लगता है ......

मैं क्यों औरों के गीत लिखूँ , क्यूँ नारी का श्रृंगार लिखूँ ।
मैं क्यूँ ना अपनी ग़ज़लों में अपने गीतों में प्यार लिखूँ ।


क्यूँ राजाओं की गाथाएं , मेरी रचनाओं में आएं;
व्यभिचार,छल,कपट और युद्ध की बातें कवि क्योंकर गाए;
सत्तालोलुप,कामी को क्यूँ मैं ईश्वर का अवतार लिखूँ.......


सुन्दर चेहरा, काली आँखें,होठों की लाली क्या लिखना;
सबमें होती हैं जो बातें वो, बात निराली क्या लिखना;
मैं क्यूँ नारी के अंगो का अश्लील भरा विस्तार लिखूँ........


ये ठंडी हवा,बादल,पर्वत, ये बहती नदिया, ये सागर;
ईश्वर ने दिया है जो उनमें है प्रेम का कद सबसे ऊपर;
मेरी इच्छा है जीवन भर ये प्रकृति का उपहार लिखूँ......

Saturday, April 18, 2009

तुमसे कोई गिला नही है

बी०म्यूज० के दौरान कुछ जब कोई नया राग सीखता था,तो प्रयास करता था कि उस राग पर कोई रचना लिखूँ।यह उसी का परिणाम है। राग शुद्ध कल्याण में बनायी इसकी धुन मुझे बहुत प्रिय है,रचना तो पसन्द है ही। अब आप को यह कैसी लगती है,ये देखना है.......


तुमसे कोई गिला नहीं है।
प्यार हमेशा मिला नहीं है।

कांटे भी खिलते हैं चमन में,
फ़ूल हमेशा खिला नहीं है।

जिसको मंज़िल मिल ही जाए,
ऐसा हर काफ़िला नहीं है।

सदियों से होता आया है,
ये पहला सिलसिला नहीं है।

अनचाही हर चीज मिली है,
जो चाहा वो मिला नहीं है।

देर से तुम इसको समझोगे,
जफ़ा, वफ़ा का सिला नहीं है।

जिस्म का नाजुक हिस्सा है दिल,
ये पत्थर का किला नहीं है।

Tuesday, April 14, 2009

गीत/चाहा था हँसना हमको

चाहा था हँसना हमको रोना पडा़ ।
आसुँओं से आँखों को भिगोना पडा़।

जैसे सावन की ये घटाएं सिर्फ़ बरसना जानें,
अंखिया बरसे दिल की हसरत को ये ना पहचाने,
चाहा था पाना जिसको खोना पडा़ ...................

दिल की मेरी सारी बातें रह गयीं मेरे दिल में,
तनहाई ले आयी मुझको ग़म से भरे महफ़िल में,
हर इक खुशी से हाथ मुझको धोना पडा़ ...........

रही बराबर दूरी हरदम मंजिल और कदम की,
पूरे जीवन रहीं बहारें ग़म से भरे मौसम की,
सर पे इतना बोझ गमों का ढोना पडा ...........

Sunday, April 12, 2009

नाराजगी भी है तुमसे प्यार भी तो है

नाराजगी भी है तुमसे प्यार भी तो है ।
दिल तोड़ने वाले तू मेरा यार भी तो है ।

मुझे बेकरार कर गयी है ये तेरी बेरुखी,
और उसपे सितम ये तू ही करार भी तो है।


जब चाहता हूँ इतना तो क्यों ख़फ़ा न होऊं,
तेरे बिना मेरा जीना दुश्वार भी तो है ।


तुमसे ही मेरी जिन्दगी वीरान हुई है,
तुमसे ही जिन्दगी ये खुशगवार भी तो है।


दोनों के लुत्फ़ हैं यहां इस एक इश्क में,
कुछ जीत भी है इश्क में कुछ हार भी तो है।


वैसे तो मेरा दिल जरूर तुमसे ख़फ़ा है,
तुमको ही ढूंढता ये बार बार भी तो है ।


Sunday, April 5, 2009

सुनने के लिए है न सुनाने के लिए है

अपनी ये रचना मैं स्वर्गीय मोहम्मद सलीम राही को समर्पित करता हूँ जो आकाशवाणी वाराणसी में कार्यरत थे और एक अच्छे शायर थे।उन्होंने मेरी ग़ज़लों को बहुत सराहा और ये रचना उन्हें बहुत अच्छी लगती थी।इसको उन्हीं की वजह से सेतु [ एक संस्था जिसमें संगीतमय प्रस्तुति होती थी ] में शामिल किया गया था और इसे ambika keshari ने अपनी आवाज़ दी थी।


सुनने के लिए है न सुनाने के लिए है ।
ये बात अभी सबसे छुपाने के लिए है ।

दुनिया के बाज़ार में बेचो न इसे तुम ,
ये बात अभी दिल के खजाने के लिए है ।

इस बात की चिंगारी अगर फ़ैल गयी तो ,
तैयार जहाँ आग लगाने के लिए है ।

आंसू कभी आ जाए तो जाहिर न ये करना ,
ये गम तेरा मुझ जैसे दीवाने के लिए है ।

होता रहा है होगा अभी प्यार पे सितम ,
ये बात जमानों से ज़माने के लिए है ।

तुम प्यार की बातों को जुबां से नहीं कहना ,
ये बात निगाहों से बताने के लिए है ।

Saturday, April 4, 2009

गीत/प्रसन्नवदन चतुर्वेदी /जिंदगी ने कई दिन दिखाए

जिंदगी ने कई दिन दिखाए ।
कभी रोये कभी मुस्कुराये ।

कभी पाते रहे कभी खोते रहे ,
कभी जगते रहे कभी सोते रहे ,
इस तरह वक्त हमने बिताये ।
कभी रोये कभी मुस्कुराए ।


कभी शिकवा किया कभी वादे किए ,
कभी हमने नए कुछ इरादे किए ,
तेज आंधी में भी न डगमगाए ।
कभी रोये कभी मुस्कुराए ।

कभी ठोकर मिला कभी आहें मिली ,
कभी मंजिल की ओर जाती राहें मिली ,
मंजिलों पे कदम भी बढाए ।
कभी रोये कभी मुस्कुराए ।

काम बनते रहे और बिगड़ते रहे ,
लोग मिलते रहे और बिछड़ते रहे ,
जो गए लौट कर फ़िर न आए ।
कभी रोये कभी मुस्कुराए ।

Friday, February 13, 2009

जा रहा है जिधर बेखबर आदमी

जा रहा है जिधर बेखबर आदमी ।
वो नहीं मंजिलों की डगर आदमी ।


उसके मन में है हैवान बैठा हुआ,
आ रहा है हमें जो नज़र आदमी ।


नफरतों की हुकूमत बढ़ी इस कदर,
आदमी जल रहा देखकर आदमी ।


दोस्त पर भी भरोसा नहीं रह गया,
आ गया है ये किस मोड़ पर आदमी ।


क्या करेगा ये दौलत मरने के बाद,
मुझको इतना बता सोचकर आदमी ।


इस जहाँ में तू चाहे किसी से न डर ,
अपने दिल की अदालत से डर आदमी । 


 हर बुराई सुराखें है इस नाव की,
जिन्दगी नाव है नाव पर आदमी ।
 

आदमी है तो कुछ आदमीयत भी रख,
गैर का गम भी महसूस कर आदमी ।


तू समझदार है ना कहीं और जा,
ख़ुद से ही ख़ुद कभी बात कर आदमी ।