Saturday, December 19, 2009

जब भी सोचूँ अच्छा सोचूँ

जब भी सोचूँ अच्छा सोचूँ।
मैं तो केवल इतना सोचूँ।

बालिग होकर ये मुश्किल है,
आओ खुद को बच्चा सोचूँ।


सोच रहे हैं सब पैसों की,
लेकिन मैं तो दिल का सोचूँ।

बातों की तलवार चलाए,
कैसे उसको अपना सोचूँ।

ऊपर वाला भी कुछ सोचे,
मैं ही क्योंकर अपना सोचूँ।


जो भी होगा अच्छा होगा,
मैं बस क्या है करना सोचूँ।

Saturday, November 28, 2009

प्यार तब और बढ़ा

मित्रों!अपने तीन ब्लाग मेरी गज़लें,मेरे गीत और रोमांटिक रचनायें को इस एक ही ब्लाग में समेटने के बाद मैंने रोमांटिक रचनायें कम ही पोस्ट की है । इस बार एक गीत प्रस्तुत है-


प्यार तब और बढ़ा और बढ़ा और बढ़ा,
जब लगाये गये पहरे प्यार के ऊपर.....

कोई अनारकली दीवार में चुनवाई गई,
कोई लैला कहीं यूं ही तड़पाई गई,
यूं सरेआम जमाने में रुसवाई हुई,
सितम जो ढाए गए कर सके कोई असर...
प्यार तब और बढ़ा और बढ़ा और बढ़ा.....

कहीं पे कैस कोई प्यार में दीवाना हुआ,
कहीं रांझा कोई हीर का निशाना हुआ,
और हर प्यार के खिलाफ़ ये जमाना हुआ,
मर गये इश्क के मारे ये सितम सह-सह कर...
प्यार तब और बढ़ा और बढ़ा और बढ़ा........

Wednesday, November 18, 2009

जीवन की एक महत्वपूर्ण यात्रा

आज आप को अपने जीवन की एक बहुत ही यादगार यात्रा का विवरण देना चाहूँगा।ये यात्रा मात्र नही है बल्कि एक तीर्थयात्रा है जो देश के हर नागरिक को अवश्य करनी चाहिये।यह यात्रा है अमर देशभक्त शहीद भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव की समाधि और हुसैनीवाला बार्डर पर भारत-पाक सीमा पर दोनों देशों की सेनाओं द्वारा किये जाने वाले परेड का।सबसे पहले मैं इस यात्रा के संयोजक और अपने अग्रज आदरणीय रमेश सचदेवा जी को बहुत-बहुत धन्यवाद देना चाहूँगा क्योंकि उनकी वजह से ही हम इस पवित्र धरती के दर्शन कर सके वरना हमारे लिये तो ये सपना ही रहता।हमारे साथ-साथ हरियाणा पब्लिक स्कूल मंडी डबवाली और शेरगढ़ के छात्र-छात्रायें भी थे और कुछ विशेष अतिथि भी।मैंने अपनी पत्नी,पुत्री और पुत्र के साथ यह यादगार यात्रा की.......
सबसे पहले हमने १९६५ के युद्ध में पाकिस्तान से जीत के बाद बरामद ये टैंक देखा[देखिये चित्र-१,२,३,४]।
अब पहले मैं इस जगह के बारे में बताना चाहूंगा........ [चित्र -५-२३]-
पंजाब के फीरोजपुर जिले में स्थित इस स्थान का ऐतिहासिक महत्व है।भगत सिंह,राजगुरु और सुखदेव को लाहौर में रातों-रात उनके शहीद होने के बाद अंग्रेजों ने उनके मृत शरीर को यहाँ लाकर मिट्टी का तेल छिड़ककर जला दिया।१९६५ में भारत-पाक युद्ध में पाक ने इस जगह कब्जा कर लिया और उनकी मुर्तियों आदि को पाकिस्तान लेकर चले गये।१९७१ के युद्ध में पराजित होने के बाद शिमला-समझौता के अन्तर्गत पुन: ये क्षेत्र भारत के पास आया। इन शहीदों की समाधि के साथ ही शहीद बटुकेश्वर दत्त की भी समाधि है क्योंकि उन्होनें अपनी मृत्यु के बाद यहीं पर अपनी समाधि की इच्छा प्रकट की थी।पास ही शहीद भगत सिंह की माता श्रीमती विदिया वती; जिन्हें १९७३ में पंजाब सरकार ने ‘पंजाब माता’ के खिताब से सम्मानित किया था और जिन्होनें इन शहीदों के साथ ही अपनी समाधि बनाने की इच्छा जताई थी;की समाधि भी उनके स्वर्गवास के बाद १९७४ में बनाई गई।
दर असल यह स्थल आजादी के पहले रेलवे स्टेशन था और लाहौर तक रेलवे मार्ग से जुड़ता था।इस पुराने रेलवे-स्टेशन की दीवारों पर १९६५ के भारत -पाक युद्ध के बीच गोलीबारी के साक्ष्य अब भी देखे जा सकते हैं।
चित्र-२४-२७ -[हुसैनीवाला बार्डर पर भारत-पाक सीमा पर दोनों देशों की सेनाओं द्वारा किये जाने वाला परेड]-यह भी एक रोचक और गौरवपूर्ण अनुभव था।दोनों ओर के सैनिकों के प्रदर्शन के समय नागरिक अपने-अपने देश के सैनिकों का उत्साहवर्द्धन कर रहे थे।कभी-कभी तो माहौल में वीर-रस का इतना प्रभाव हो जाता था कि हर कोई अपने को सैनिक अनुभव कर रहा था।वाह.....इस अनुभव को बस महसूस किया जा सकता है.....


















































Friday, October 30, 2009

यार नहीं जो काम न आए

बहुत दिनों बाद आज कोई रचना प्रस्तुत कर रहा हूँ..दरअसल मैं लगभग १ माह नेट से दूर रहा...आशा है आप को अवश्य पसंद आएगी ...

यार नहीं जो काम न आए।
प्यार वही जो साथ निभाए।

आता वक्त बुरा तो अक्सर,
जिससे आशा वो ठुकराए।

दिन में ही कुछ कोशिश कर लो,
जिससे काली रात न आए।

वक्त अगर बीतेगा ये भी,
दोबारा फिर हाथ न आए।

भाई-भाई अब लड़ते हैं,
आपस में ये बात न आए।

तू-तू,मैं-मैं करती दुनिया,
ऐसे तो हालात न आए।

सच पूछो तो वो ही जवां है,
जो मिट्टी का कर्ज़ चुकाए।

Sunday, September 27, 2009

देवेन्द्र आर्य की ग़ज़लें

इस बार गोरखपुर के देवेन्द्र आर्य जी की ग़ज़लें प्रस्तुत हैं...









जो है सच्ची वही खुशी रखिये

संभवत: ३०-०९-०९ को १५ दिनों के लिए दिल्ली जाना हो,इस कारण हो सकता है कि अगला पोस्ट वहीं से प्रस्तुत करुँ....तब तक ये ग़ज़ल प्रस्तुत है....

जो है सच्ची वही खुशी रखिए।
सीधी-सादी सी ज़िन्दगी रखिये ।

जो बुरे दिन में काम आते हों,
ऐसे लोगों से दोस्ती रखिए।

वक्त जब भी लगे अंधेरे में,
साथ यादों की रौशनी रखिए।

ग़म ये कहना सभी से ठीक नहीं,
राज अपना ये दिल में ही रखिए।

चीज कोई जो तुमको पानी हो,
चाहतों में दीवानगी रखिए।

दोस्ती दुश्मनी न बन जाये,
अपने काबू में दिल्लगी रखिए।

देवता आप मत बनें यारों,
आप अपने को आदमी रखिए।

लुत्फ़ तब दुश्मनी का आयेगा,
साथ कांटों के फूल भी रखिए।

Sunday, September 20, 2009

भजन/मन की बात समझने वाले

अब मैनें अपने सभी निजी ब्लागों जैसे ‘मेरी ग़ज़ल’,‘मेरे गीत’ और ‘रोमांटिक रचनाएं’ को एक ही ब्लाग मेरी ग़ज़लें,मेरे गीत/प्रसन्नवदन चतुर्वेदी'' में पिरो दिया है।दरअसल मैं चाहता हूँ कि आप मेरी हर रचना देंखें परन्तु सभी दर्शकगण और पाठक अलग-अलग ब्लाग्स पर सभी रचनाएं नहीं पढ़ पाते थे।मेरी ग़ज़ल’,‘मेरे गीत’ और ‘रोमांटिक रचनाएं’ के सभी अनुसरणकर्ता बन्धुओं और मित्रों से अनुरोध है कि वे मेरी ग़ज़ल’,‘मेरे गीत’ और ‘रोमांटिक रचनाएं’ पर से अनुसरण हटा लें और मेरे इस ब्लाग मेरी ग़ज़लें, मेरे गीत/प्रसन्नवदन चतुर्वेदी' का एक बार पुनः अनुसरण कर लें;असुविधा के लिये क्षमा प्रार्थी हूँ।नवरात्रि के शुभ अवसर पर एक भजन प्रस्तुत है....

मन की बात समझने वाले, तुमको भला मैं क्या बतलाऊँ।
मैं तो तेरे दर पे खडा़ हूँ, इच्छा पूरी कर दो जाऊँ।


मिट्टी का तन मैंने पाया,
मिट्टी को कंचन से सजाया,
ज्यादा खोया कम ही पाया,
इसी भरम में जन्म गंवाया,
बीत गई है उम्र ये जैसे,अब ना बाकी उम्र गंवाऊँ...


मंदिर में बस आये-जाये,
मन पर पाप का मैल चढा़ये,
भक्त ये प्रभु को भी बहकाये,
लड्डू-पेड़ों से बहलाये,
सारी सृष्टि रचने वाले,मैं क्या तुमको भोग लगाऊँ...

Sunday, September 13, 2009

कैसे कह दें प्यार नहीं है

अब कुछ प्यार की बात भी हो जाए...है न...

कैसे कह दें प्यार नहीं है।
हम पत्थरदिल यार नहीं हैं।

अपनी बस इतनी मजबूरी,
होता बस इज़हार नहीं है।

मिलने का कुछ कारण होगा,
ये मिलना बेकार नहीं है।

तुम मुझको अच्छे लगते हो,
अब इससे इनकार नहीं है।

कुछ लोगों से मन मिलता है,
इससे क्या गर यार नहीं हैं।

तुम फूलों सी नाजुक हो तो,
हम भौरें हैं खा़र नहीं है।

क्या मेरे दिल में रह लोगे,
बंगला,मोटरकार नहीं है।

तनहा-तनहा जीना मुश्किल,
संग तेरे दुश्वार नहीं है।

हुश्न की नैया डूबी-डूबी,
इश्क अगर पतवार नहीं है।

मैं तबतक साधू रहता हूँ,
जबतक आँखें चार नहीं हैं ।


कृपया बनारस के कवि/शायर,समकालीन ग़ज़ल [पत्रिका] में नई ग़ज़लें जरूर देंखे ...और टिप्पणी भी दें...

Sunday, September 6, 2009

ग़ज़ल/संजीदगी से गाओ ये गीत दर्द का है

अक्सर हम गायकों को गीत गाते हुए सुनते हैं|मुझे एक बार ख्याल आया की शायद कभी ऐसा भी होता होगा कि गीत तो दर्द भरा हो,पर गायक उसे हलके-फुल्के अंदाज़ में गाए जा रहा हो|जबकि उसे संजीदगी से वह गीत गाना चाहिए था|बस बन गई कुछ पंक्तियाँ --

संजीदगी से गाओ ये गीत दर्द का है
ऐसे मुस्कुराओ ये गीत दर्द का है

शायर का दर्द तेरी आवाज़ में भी उभरे,
ऐसी कशिश से गाओ ये गीत दर्द का है

गुजरा है ये तुम्हीं पर ऐसा लगे सभी को,
आँखों में अश्क लाओ ये गीत दर्द का है

जितने भी सुन रहे हों उस गम में डूब जायें,
कुछ यूँ समां बनाओ
ये गीत दर्द का है

जब लिख रहा था इसको रोया बहुत था दिल ये,
वो दर्द फिर जगाओ
ये गीत दर्द का है

वो सच्ची शायरी है दिल पर असर करे जो,
दिल में जगह बनाओ
ये गीत दर्द का है।

बनारस के कवि/शायर-केशव शरण

बनारस के कवि/शायर में इस बार केशव शरण की रचनाएं आप के लिये प्रस्तुत है। केशव शरण बनारस के जाने -पहचाने रचनाकार हैं। इनका जन्म 23-08-1960 को वाराणसी में हुआ, आप के पिता स्व० शिवब्रत सिंह यादव और माता का नाम श्रीमती बासमती देवी है और आप सरकारी सेवा में हैं। आप की प्रकाशित रचनाएं हैं- ‘तालाब के पानी में लड़की’, ‘जिधर खुला व्योम होता है’ [दोनों कविता-संग्रह], ‘दर्द के खेत में’ [ग़ज़ल-संग्रह] और ‘कडी़ धूप में’ [ हाइकू-संग्रह ]।






1. कौन अब है आने वाला :-

कौन अब है आने वाला ।
जा चुका है जाने वाला  ।   


हाथ मलता रह गया है,

पा न पाया पाने वाला ।


कौन उसको चुप कराये,

रो रहा है गाने वाला ।


तू तो थोडी़ दे तसल्ली,
हर कोई है ताने वाला ।


दर्द से वाकि़फ़ नहीं है,
दिल को वो समझाने वाला ।


क्या न ये उल्फ़त कराये,
काम ये दीवाने वाला ।


हो नहीं सकता है कोई,

उसके जैसा भाने वाला ।


छीन बैठा चांद मेरा,
मेघ काला छाने वाला ।


अब नहीं आबाद होगा,

मेरा घर वीराने वाला

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2. मुहब्बत के पीछे ज़माना पडा़ है :-

मुहब्बत के पीछे ज़माना पडा़ है।
मुझे प्यार अपना छुपाना पडा़ है।   


बुरा होता दुनिया को नाराज़ करना,

मुझे अपने दिल को दुखाना पडा़ है।


यहाँ आज खुशियों के लाले हुए हैं,

जहां पर ग़मों का ख़ज़ाना पडा़ है।


जो मैं रो रहा था तो कोई न रोया,
सभी गा रहे हैं तो गाना पडा़ है।


बगा़वत कहीं इससे आसान होती,
मुझे खु़द को जितना मनाना पडा़ है।


नहीं कोई विश्वास रिश्तों पे हमको,
मगर जग के नाते निभाना पडा़ है।


कहाँ तेरे आगोश में मस्त रहता,

कहाँ पस्त तेरा दीवाना पडा़ है।

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3. बयां क्या दूं सफ़र की मुश्किलों पर :-

बयां क्या दूं सफ़र की मुश्किलों पर।
ये राहें ले न जाती मंजिलों पर।
 


बिखर जाना है इनको बीहडो़ में,
भरोसा क्या करूँ मैं काफ़िलों पर। 


 मैं तनहाई का जो इल्जाम धरता,
तो जाता वो तुम्हारी महफ़िलों पर।


बहुत भारी है दिलबर को गवाना,

जमाने भर के सारे हासिलों पर।  


कोई-कोई समुन्दर में उतरता,
पडी़ रहती है दुनिया साहिलों पर।

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4. अजब मैं भी जफ़ाओं पर फ़िदा हूँ :-

अजब मैं भी जफ़ाओं पर फ़िदा हूँ।
हसीनों की अदाओं पर फ़िदा हूँ


बरसना जो नहीं कुछ जानती हैं,

उन्हीं रंगी घटाओं पर फ़िदा हूँ।
   


पुराना पेड़ सूखा जा रहा है,

अमरबेलों,लताओं पर फ़िदा हूँ।


वतन की खुश्बुएं ले जा रहीं है,

विदेशों की हवाओं पर फ़िदा हूँ।


ग़रीबी भूल जाता हूँ मैं अपनी,

अमीरी की कथाओं पर फ़िदा हूँ।


अकेलापन नहीं जाता है लेकिन,
मैं इन्दर की सभाओं पर फ़िदा हूँ


जो मायावी बदन की मालकिन है,
मैं ऐसी आत्माओं पर फ़िदा हूँ।


बढा़ ही जा रहा है मर्ज़ मेरा,

मगर तेरी दवाओं पर फ़िदा हूँ।

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 5. अभी इतिहास का वो पल नहीं :-

अभी इतिहास का वो पल नहीं आया तो आयेगा।
हमारा वो सुनहरा कल नहीं आया तो आयेगा। 


उम्मीदों के सहारे ही तो दुनिया चल रही है ये,
समस्याओं का कोई हल नहीं आया तो आयेगा।


जमाने से ये माली कह रहे हैं पेड़ अच्छा है,

अगर इस साल उस पर फल नहीं आया तो आयेगा।


डगर की शर्त पूरी है मुसाफ़िर चल पडा़ होगा,
नहर में गर लहर कर जल नहीं आया तो आयेगा।


नजूमी कह रहा है देखकर हाथों की रेखाएं,
तुम्हारा भाग्य है चंचल नहीं आया तो आयेगा।


किसी का हुश्न है मग़रूर क्या मिलना ग़रीबों से,

किसी का इश्क है पागल नहीं आया तो आयेगा।


जिसे हो देश की चिन्ता,जिसे परवाह जनता की,
कभी सरकार में वो दल नहीं आया तो आयेगा।


निवास- एस.2/564, सिकरौल,वाराणसी
मोबाइल नं०-9415295137

Sunday, August 30, 2009

बात करते हैं हम मुहब्बत की

बात करते हैं हम मुहब्बत की,और हम नफ़रतों में जीते हैं ।
खामियाँ गैर की बताते हैं ,खुद बुरी आदतों में जीते हैं ।

सबको आगे आगे जाना है,तेज रफ़्तार जिन्दगी की हुई;
भागते दौड़ते जमाने में, हम बडी़ फ़ुरसतों में जीते हैं ।

आज तो ग़म है बेबसी भी है,जिन्दगी कट रही है मुश्किल से;
आने वाला पल अच्छा होगा , हम इन्हीं हसरतों में जीते हैं ।

आज के दौर मे जीना है कठिन,और मरना बडा़ आसान हुआ;
कामयाबी बडी़ हमारी है , जो ऐसी हालतों में जीते हैं ।

मिट्टी लगती है जो भी चीज मिली,जो भी पाया नहीं वो सोना लगा; 
जो हमें चीज मिल नहीं सकती ,हम उन्हीं चाहतों में जीते हैं

कृपया बनारस के कवि/शायर, समकालीन ग़ज़ल [पत्रिका] में नई ग़ज़लें 
जरूर देंखे ... और टिप्पणी भी दें...

Friday, August 28, 2009

मुझे तनहाइयां भाती नहीं है

मुझे तनहाइयां भाती नहीं हैं। 
मैं तन्हा हूँ तू क्यों आती नहीं है।

तुझे ना देख लें जबतक ये नज़रें,
सुकूं पल भर भी ये पाती नहीं है।

गये हो दूर तुम जबसे यहाँ से,
बहारें भी यहाँ आती नहीं है।

तराने गूंजते थे कल तुम्हारे,
वहाँ कोयल भी अब गाती
नहीं है।

तुझे अपना बनाना चाहता था,
कसक दिल की अभी जाती
नहीं है।

शिकायत है यही किस्मत से अपने,
मुझे ये तुमसे मिलवाती
नहीं है।


कृपया बनारस के कवि/शाय,समकालीन ग़ज़ल [पत्रिका] में नई ग़ज़लें जरूर देंखे ...

Saturday, August 22, 2009

मंजिल को पाने की खातिर

मंजिल को पाने की खातिर , कोई राह बनानी होगी ।
दूर अंधेरे को करने को , कोई शमा जलानी होगी ।

अंगारों पर चलना होगा , काँटों पर सोना होगा ;
कितने ख्वाब तोड़ने होंगे , कितनी चाह मिटानी होगी ।

बस दो ही तो राहें अपने , इस जीवन में होती हैं ;
अच्छी राह चुनो तो अच्छा , बुरी राह नादानी होगी ।

इतना भी आसान नहीं है , मंजिल को यूँ पा लेना ;
कुछ पाने की खातिर तुमको , देनी कुछ कुर्बानी होगी।

लीक से हटकर चलना तो अच्छा है लेकिन मुश्किल है;
दिल का हौसला जारी रखोगे तो बड़ी आसानी होगी ।

पैदा होकर मर जाते हैं , जाने कितने लोग यहाँ ;
लेकिन नया करोगे कुछ तो , तेरी अमर कहानी होगी ।

दुनिया वाले कुछ बोलेंगे , जैसी उनकी आदत है;
लेकिन जब मंजिल पा लोगे , दुनिया पानी पानी होगी

Friday, August 21, 2009

बनारस में एक कवि गोष्ठी

दिनांक 20-08-09 को वाराणसी में नई दिल्ली से पधारे श्री अमित दहिया ‘बादशाह’,कुलदीप खन्ना,सुश्री शिखा खन्ना,विकास आदि की उपस्थिति में श्री उमाशंकर चतुर्वेदी‘कंचन’ के निवास स्थान पर एक काव्य-गोष्ठी का आयोजन हुआ जिसमें इनके और मेरे अतिरिक्त देवेन्द्र पाण्डेय,नागेश शाण्डिल्य,विन्ध्याचल पाण्डेय, ,शिवशंकर ‘बाबा’,अख्तर बनारसी आदि कवि मित्रों ने भाग लेकर काव्य-गोष्ठी को एक ऊचाँई प्रदान की।प्रस्तुत काव्य-गोष्ठी के कुछ चित्र मेरे ब्लॉग 'कुछ हमसे सुनो कुछ हमसे कहो' पर देंखे ....

कुलदीप खन्ना,देवेन्द्र पांडे,अमित दहिया'बादशाह' उमाशंकर चतुर्वेदी'कंचन'














शिखा खन्ना और विकास















उमाशंकर चतुर्वेदी'कंचन',विंध्याचल पाण्डेय,प्रसन्न वदन चतुर्वेदी और शिवशंकर 'बाबा'














शिखा खन्ना और विकास













































कुलदीप खन्ना,देवेन्द्र पांडे,














देवेन्द्र पांडे,अमित दहिया'बादशाह'















Friday, August 14, 2009

है कठिन इस जिंदगी के हादसों को

है कठिन इस जिंदगी के हादसों को रोकना ।
मुस्कराहट रोकना या आसुओं को रोकना ।

वक्त कैसा आएगा आगे न जाने ये कोई ,
इसलिए मुश्किल है शायद मुश्किलों को रोकना ।

मंजिलों की ओर जाने के लिए हैं रास्ते,
इसलिए मुमकिन नहीं है रास्तों को रोकना ।

इनको होना था तभी तो हो गए होते गए ,
चाहते तो हम भी थे इन फासलों को रोकना ।

दोस्तों के रूप में अक्सर छुपे रहते हैं ये,
इसलिये आसां नहीं है दुश्मनों को रोकना ।

भजन/दर्शन दो प्रभु कबसे खड़े हैं

आज श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के शुभ अवसर पर मैं अपना लिखा एक भजन प्रस्तुत कर रहा हूँ.....

दर्शन दो प्रभु कबसे खड़े हैं।
हम भारी विपदा में पड़े हैं।

कोई नहीं प्रभु-सा रखवाला,
मेरे कष्ट मिटाने वाला,
जीवन में कर दीजै उजाला;
आप दयालू नाथ बड़े हैं.......

झूठी माया झूठी काया,
लेकर मैं दुनिया में आया,
दुनिया में है पाप समाया;
भरते पाप के रोज़ घड़े हैं........

पाप हटे मिट जाये बुराई,
सबमें पडे़ प्रभु आप दिखाई,
इच्छाओं ने दौड़ लगाई;
कितनी गहरी मन की जड़े है.......

Sunday, August 9, 2009

बनारस के कवि और शायर/रामदास अकेला

बनारस के शायर की अगली कडी़ में रामदास अकेला जी की रचनाएं प्रस्तुत हैं।आप की जन्मतिथि है २४-०३-१९४२|जन्मतिथि है-ग्राम-लखनेपुर,पो०-घनश्यामपुर जिला-जौनपुर| आप के पिता का नाम है- स्व० बलीराम भगत।आप प्रवर अधीक्षक [डाक विभाग] के पद से सेवा निवृत्त होकर साहित्य सेवा में संलग्न है।गीत,ग़ज़ल,मुक्तक एवं नवगीतों की रचना आप को विशेष रूप से पसन्द है।आप द्वारा रचित ‘आईने बोलते हैं’ ग़ज़ल संग्रह 1999 में प्रकाशित।आप की बहुत सी रचनाएं दूरदर्शन और आकाशवाणी पर प्रसारित हो चुकी हैं।आप अदबी-संगम[हिन्दी-उर्दू साहित्यिक संस्था]वाराणसी के अध्यक्ष तथा प्रगतिशील लेखक संघ के उपाध्यक्ष भी हैं।

1. कैसे-कैसे इसे गुजारी है :-

कैसे-कैसे इसे गुजारी है।
ज़िन्दगी यार फिर भी प्यारी है।

मालोज़र की कोई कमी तो नही,
हाँ मगर प्यार की दुश्वारी है।

ज़िन्दगी कौन कब तलक ढोता,
ये तो खु़द मौत की सवारी है।

बाप मरता तो भला कैसे वो,
जिसकी बेटी अभी कुँवारी है।

भार से डालियों के टूट रहे,
ये दरख्तों की अदाकारी है।

ये तो गुज़री है नींद में यारों,
भरम रहा कि शब्बेदारी है।

होश में कैसे ’अकेला’ रहता,
होशवालों में मारामारी है।


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2. ज़िन्दगी के वास्ते क्या-क्या है :-

ज़िन्दगी के वास्ते क्या-क्या है करता आदमी।
अपनी ही परछाइयों से डर के मरता आदमी।

अपने हक़ में कोई भी तामीर क्या कर पायेगा,
खण्डहरों की ईंट सा खुद ही बिखरता आदमी।

रख दिया है आईना जबसे सड़क के बीच में,
मुँह बनाता फेरकर चेहरा बनाता आदमी।

रंग, नस्लों, धर्म,मज़हब जातियां दर जातियां,
अनगिनत फिरकों में जुड़ता और बिखरता आदमी।

थे ज़मीं था आसमां परवाज में इसके कभी,
परकटे पंछी सा है अब फड़फडा़ता आदमी।

दावतों के बाद जूठन फेंक देता जब कोई,
ढेर पर कुडे़ के चुन कर पेट भरता आदमी।

किस कदर नाराज़ लगता है ये अपने आप से,
बुदबुदाता फिर रहा है पागलों सा आदमी।

ज़िन्दगी भर दूसरों की फ़िक्र में उलझा रहा,
अपने बारे में कभी कुछ फ़िक्र करता आदमी।

एक मुट्ठी खा़क पर करता रहा इतना गुमान,
काश मिट्टी की हकी़क़त को समझता आदमी।

अपनी इक पहचान तो इसको बनानी चाहिए,
काफ़िले के साथ हो या हो अकेला आदमी।


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3.बोलियाँ अब न भाषाएं वही :-

बोलियाँ अब न भाषाएं वही।
कब तलक गायेंगे गाथाएं वही।

कारवां लेकर हमारा चल पडे़,
जो खडी़ करते हैं बाधाएं वही।

आँख के अन्धे हैं लेकिन लिख रहे,
कौम के माथे की रेखाएं वही।

हम रहे अब भी लकीरों के फकीर,
तोड़ते अक्सर हैं सीमाएं वही।

अस्मिता जिनसे वतन की दावं पर,
हाय वन्देमातरम गाएं वही।

चीखते हैं जो धरम के नाम पर,
नफ़रतों की आग भड़काएं वही।

हाथ में लेकर चले हो आईना,
देखना पत्थर न फिर आएं वही।

चल ‘अकेला’कुछ नई बातें करें,
मत सुनाना फिर से कविताएं वही।

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4. चढ़ तो गये ऊँचाइयों पे धूमधाम से :-

चढ़ तो गये ऊँचाइयों पे धूमधाम से।
बदली नज़र तो गिर पडे़ औंधे धडा़म से।

करता रहा सलाम,कभी झुक के दूर से,
करने लगा है बात वही तुम-तडा़म से।

बदले हुए मौसम की ये तासीर खूब है,
मेढक भी परेशान है सर्दी-जु़काम से।

हाथों से निकल तोते बहुत दूर उड़ गये,
रखा था जिन्हें हमने बहुत एहतेमाम से।

औरों के हाल पर तो हँसे भूल क्यूँ गये,
तुमको भी गुजरना है कभी उस मुकाम से।

गुम होके रह गया है इसी भीड़ में कहीं,
निकला तो ‘अकेला’ था किसी और काम से।


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5. संसद से सड़कों तक देखा :-

संसद से सड़कों तक देखा सब उद्योग लगे।
बेकारी से फिर भी जूझते हमको लोग लगे।

खुद क्या थे,क्या हैं,क्या होंगे;क्या मालूम उन्हें,
औरों का कद छोता करने में जो लोग लगे।

वो क्या जाने भूख की शिद्दत कीमत रोटी की,
भक्तों के आटा-घी से ही जिनका भोग लगे।

हम खोये रहते तलाश में जीवन भर जिसकी,
उनकी नज़र में एक समाधी और संभोग लगे।

ईर्ष्या,द्वेष,अहं और नफरत,लालच,बेइमानी;
एक बेचारे मन को जाने कितने रोग लगे।

तनहाई में यूँ ही अकेला भटकेगा कब तक,
साथ तुम्हारे लोग भी आयें कब संयोग लगे।

Friday, July 31, 2009

एक शायर/ डा0 गिरिराजशरण अग्रवाल






एक
शायर के इस अंक में डा० गिरिराजशरण अग्रवाल की रचनाएं प्रस्तुत हैं।डा० गिरिराजशरण अग्रवाल का जन्म सन 1944 ई० में सम्भल[उ०प्र०]में हुआ।डा०अग्रवाल की पहली पुस्तक सन 1964 ई० में प्रकशित हुई,तबसे आप द्वारा लिखित और सम्पादित एक सौ से अधिक पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं,एकांकी,व्यंग्य,ललित निबन्ध और बाल साहित्य के लेखन में संलग्न डा० गिरिराजशरण अग्रवाल वर्तमान में वर्धमान स्नातकोत्तर महाविद्यालय,बिजनौर में हिन्दी विभाग में रीडर एवं अध्यक्ष हैं।हिन्दी शोध तथा सन्दर्भ साहित्य की दृष्टि से प्रकाशित उनके विशिष्ट ग्रन्थों-`शोध सन्दर्भ’,`सूर साहित्य सन्दर्भऔर `हिन्दी साहित्य सन्दर्भ कोशको गौरवपूर्ण स्थान प्राप्त हुआ है।
पुरस्कार एवं सम्मान-उ०प्र० हिन्दी संस्थान,लखनऊ द्वारा व्यंग्यकृतिबाबू झोलानाथ’[1998] तथाराजनीति में गिरगिटवाद’[2002] पुरस्कृत;राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग,नई दिल्ली द्वारामानवाधिकार:दशा और दिशा’[1999] पुरस्कृत।आओ अतीत में लौट चलेंपर उ०प्र० हिन्दी संस्थान,लखनऊ द्वारासूर पुरस्कारएवं डा० रतनलाल शर्मा स्मृति ट्रस्ट प्रथम पुरस्कार।अखिल भारतीय टेपा सम्मेलन,उज्जैन द्वारा सहस्त्राब्दि सम्मान [2000];अनेक अन्य संस्थाओं द्वारा सम्मानोपाधियाँ प्रदत्त।
पता-16 साहित्य विहार,बिजनौर[उ०प्र०]
फोन-01352-262375,२६३२३२




























































फुलवारी/पाँच रचनाकारों की रचनायें

1-ग़ज़ल/महेश अग्रवाल

हार किसकी है और किसकी फतह कुछ सोचिये।
जंग है ज्यादा जरुरी या सुलह कुछ सोचिये।

यूं बहुत लम्बी उडा़नें भर रहा है आदमी,
पर कहीं गुम हो गई उसकी सतह कुछ सोचिये।

मौन है इन्सानियत के कत्ल पर इन्साफ-घर,
अब कहाँ होगी भला उस पर जिरह कुछ सोचिये।

अब कहाँ ढूँढें भला अवशेष हम इमान के,
खो गई सम्भावना वाली जगह कुछ सोचिये।

दे न पाये रोटियाँ बारूद पर खर्चा करे,
या खुदा अब बन्द हो ऐसी कलह कुछ सोचिये।

आदमी ’इन्सान’ बनकर रह नहीं पाया यहाँ,
क्या तलाशी जायेगी इसकी वजह कुछ सोचिये।


पता-71,लक्ष्मी नगर,रायसेन रोड
भोपाल-462021 म.प्र.
मो.-9229112607
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2-ग़ज़ल/कृष्ण सुकुमार

भड़कने की पहले दुआ दी गयी थी।
मुझे फिर हवा पर हवा दी गयी थी।

मैं अपने ही भीतर छुपा रह गया हूँ,
ये जीने की कैसी अदा दी गयी थी।

बिछु्ड़ना लिखा था मुकद्दर में जब तो,
पलट कर मुझे क्यों सदा दी गयी थी।

अँधेरों से जब मैं उजालों की जानिब
बढा़,शम्मा तब ही बुझा दी गयी थी।

मुझे तोड़ कर फिर से जोडा़ गया था,
मेरी हैसियत यूँ बता दी गयी थी।

सफर काटकर जब मैं लौटा तो पाया,
मेरी शख्सियत ही भुला दी गयी थी।

गुनहगार अब भी बचे फिर रहे हैं,
तो सोचो किसे फिर सज़ा दी गयी थी।

पता-193/7,सोलानी कुंज,
भारतीय प्रोद्योगिकी संस्थान,
रुड़की-247667[उत्तराखण्ड]

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3-ग़ज़ल/माधव कौशिक

खुशबुओं को जुबान मत देना।
धूप को जुबान सायबान मत देना।

अपना सब कुछ तो दे दिया तुमने,
अब किसी को लगान मत देना।

कोई रिश्ता ज़मीन से न रहे,
इतनी ऊँची उडा़न मत देना।

उनके मुंसिफ़,अदालतें उनकी,
देखो,सच्चा बयान मत देना।

जिनके तरकश में कोई तीर नहीं,
उनको साबुत कमान मत देना।

पता-1110,सेक्टर-41-बी
चण्डीगढ़-160036
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4-ग़ज़ल/मुफ़लिस लुधियानवी

हर मुखौटे के तले एक मुखौटा निकला।
अब तो हर शख्स के चेहरे ही पे चेहरा निकला।

आजमाईश तो गलत-फ़हमी बढा़ देती है,
इम्तिहानों का तो कुछ और नतीजा निकला।

दिल तलक जाने का रास्ता भी तो निकला दिल से,
ये शिकायत तो फ़क़त एक बहाना निकला।

सरहदें रोक न पायेंगी कभी रिश्तों को,
खुशबुओं पर न कभी कोई भी पहरा निकला।

रोज़ सड़कों पे गरजती है ये दहशत-गर्दी,
रोज़,हर रोज़ शराफत का जनाज़ा निकला।

तू सितम करने में माहिर,मैं सितम सहने में,
ज़िन्दगी!तुझसे तो रिश्ता मेरा गहरा निकला।

यूँ तो बाज़ार की फ़ीकी़-सी चमक सब पर है,
गौर से देखा तो हर शख्स ही तन्हा निकला।

पता-614/33 शाम नगर,
लुधियाना-141001
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5-ग़ज़ल/गिरधर गोपाल गट्टानी

किसने रौंदी ये फुलवारियाँ।
मेरी केशर-पगी क्यारियाँ।

हमको कैसा पडो़सी मिला,
दे रहा सिर्फ दुश्वारियाँ।

तेग की धार पर टाँग दी,
नौनिहालों की किलकारियाँ।

हमको कैसे मसीहा मिले,
बढ़ रही रोज़ बीमारियाँ।

छोड़िये भी, न अब कीजिये,
दुश्मनों की तरफ़दारियाँ।

पता-मातृ छाया,
मुख्य मार्ग,बैरसिया,
भोपाल[म.प्र.]

Sunday, July 26, 2009

गीत/मुझे याद आ रहे हैं,वो ज़िन्दगी के दिन

आज मैं एक ऐसा गीत यहाँ प्रस्तुत कर रहा हूँ जो कई मायनों में एकदम अलग है।इस गीत की खा़सियत यह है कि पूरे जीवन का वर्णन एक गीत में ही हो जाता है।है अनोखी बात!मुझे यकीन है कि आप को मेरा यह गीत जरूर पसन्द आयेगा क्योंकि यह आप के जीवन की कहानी भी तो बयां कर रहा है.........

मुझे याद आ रहे हैं ,वो ज़िन्दगी के दिन।
कुछ मेरे ग़म के दिन,कुछ मेरी खुशी के दिन।

बचपन के खेल सारे, नानी की वो कहानी;
ससुराल जो गई है, उस बहन की निशानी;
झगडा़ करना,रोना और फिर हसीं के दिन......

कुछ और बडा़ होना,कुछ और सोचना;
ख्वाबों में,खयालों में; आकाश चूमना;
आज़ाद हर तरह से, कुछ बेबसी के दिन......

गप-शप वो दोस्तों के,और हम भी उसमें शामिल,
वो शोर वो ठहाके,यारों की हसीं महफ़िल;
वो किताब-कापियों के,वो दिल्लगी के दिन.....

कुछ उम्र बढी़ और, नौजवान हम हुए;
कितनी ही हसीनों के,अरमान हम हुए;
जब सोच में तब्दीली हुई उस घडी़ के दिन.....

अब ख्वाब में आने लगे,जुल्फ़ों के वो साये;
फिर जो भी हुआ उसको,अब कैसे हम बतायें;
दीवाने हो गये हम,दीवानगी के दिन.....

फिर जैसे बहार आई,घर मेरा खिल गया;
बावस्ता उम्र भर के,इक दोस्त मिल गया;
फिर फूल कुछ खिले और, नई रौशनी के दिन.....

बच्चे बडे़ हुए अपनी उम्र बढ़ गई;
चेहरे पे झुर्रियों की,सौगात चढ़ गई;
हुए खत्म धीरे-धीरे,जीवन की लडी़ के दिन.....

चाहे जितना कष्ट उठा ले

आज अपनी एक ऐसी रचना यहाँ दे रहा हूँ जो वाराणसी के एक मशहूर गायक श्री चन्द्रशेखर चक्रवर्ती जी ने गायी है और यह रचना राग दुर्गा में उनके द्वारा निबद्ध की गयी है। इस ग़ज़ल का दूसरा शेर तथाकथित डान (अपराधी) के सन्दर्भ में तथा चौथा शेर भारतीय तथा पाश्चात्य संगीत के लिये है।आप सभी प्रबुद्धजन हैं ये अर्थ बताने की जरुरत नही है पर इच्छा हुई तो लिख दिया,आशा है आप इसके लिये नाराज़ नही होंगे।

चाहे जितना कष्ट उठा ले, अच्छाई-अच्छाई है।
खुल जाता है भेद एक दिन, सच्चाई-सच्चाई है।

होती है महसूस जरूरत, जीवन में इक साथी की,
तनहा जीवन कट नहीं सकता,तनहाई-तनहाई है।

चर्चे खूब हुए हैं तेरे,हर घर में हर महफ़िल में,
चाहे जितनी शोहरत पा ले, रुसवाई-रुसवाई है।

पूरे बदन को झटका देना,हाथों को ऊपर करके,
सच पूछो तो तेरी उम्र की, अँगडा़ई-अँगडा़ई है।

पश्चिम की पूरजोर हवा से,पैर थिरकने लगते हैं,
झूम उठता है सिर मस्ती में, पुरवाई-पुरवाई है।

भाषा अलग अलग पहनावा,अलग अलग हम रहतें हैं,
लेकिन हम सब हिन्दुस्तानी, भाई-भाई-भाई हैं।

गम़ में खुशी में एक सा रहना,जैसे एक सी रहती है;
सुख-दुख दोनों में बजती है, शहनाई-शहनाई है।

Wednesday, July 15, 2009

बनारस के शायर /नरोत्तम शिल्पी

बनारस के कवि/शायर में इस बार आप नरोत्तम शिल्पी की रचनाओं का आनन्द उठायेंगे।नरोत्तम शिल्पी का जन्म २० जनवरी सन १९४५ को काज़ीपुरा खुर्द,औरंगाबाद,वाराणसी में हुआ।आपके पिताजी का नाम मेवालाल विश्वकर्मा तथा माता का नाम श्रीमती राजकुमारी देवी है।आप मुर्तिकला और चित्रकला के जानकार हैं और इसी लिये आप ’शिल्पी’ नाम से जाने जाते हैं।आप की संगीत और नाट्य में बेहद रुचि रखते हैं।आप की प्रकाशित पुस्तक है-बुतों के बीच।आप का पता है-सी-८/२८ चेतगंज,वाराणसी।यहाँ इनकी चार ग़ज़लें और एक गीत प्रस्तुत है-




1. वक्त की शायद ये हैं अंगडा़इयाँ :-

वक्त की शायद ये हैं अंगडा़इयाँ।
हैं जुदा मुझसे मेरी परछाइयाँ। 


क्यूं कहूँ तनहा कभी मैं ना रहा,
भीड़ में हैं खल रहीं तनहाइयाँ।


धुन सुनी है जिन्दगानी के खि़लाफ़,
मौत की दस्तक हैं ये शहनाइयाँ।


कर रहे थे रहबरी जो एक दिन,
खोदते हैं अब तो वे ही खाइयाँ।


साथ में आया हूँ जिसके मैं यहाँ,
हो मुबारक उसको ये ऊँचाइयाँ।


नाम शिल्पी का बहुत बदनाम है,
क्या हुआ,बढ़ जायेगी रुसवाइयाँ।


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2. दबे पाँव आती है यादें तुम्हारी :-

दबे पाँव आती है यादें तुम्हारी।
उसी दम मचलती है धड़कन हमारी।


कलम साथ होती नहीं है हमेशा,
तसव्वुर बनाता है तस्वीर प्यारी।


हुए चन्द अशआर तेरी बदौलत,
भरी गोद कागज़ की जो थी कुँआरी।


न आए न आए कहा पर न आए,
भरे आह ये मज्बूरियाँ ये बेचारी।


करम है सनम का लुटाता है जलवा,
तबर्रुख में उलझा सनम का पुजारी।


रहम कर के क्या दे दिया ये तो सोचो,
भला कैसे जिये ये भूखा भिखारी।


जरा साथ बैठो कहीं पर कभी भी,
सुनाएं कि ’शिल्पी’ ने कैसे गुजारी।


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3. ऐसी पेचीदगी कहाँ होगी :-

ऐसी पेचीदगी कहाँ होगी।
अपनी सी ज़िन्दगी कहाँ होगी।


दर्द सहता ही नहीं पीता हूँ,
इतनी बेचारगी कहाँ होगी।


तंग दस्ती में समझना आसां,
कितनी पाबन्दगी कहाँ होगी।


फूल तो गढ़ के बना सकता हूँ,
पर वही ताज़गी कहाँ होगी।


बोझ इतना लदा है काँधे पर,
मुझसे आवारगी कहाँ होगी।


हाथ उठते नहीं दुआ के लिए,
फिर तो अब बन्दगी कहाँ होगी।


मयकदा बन्द पडा़ है कबसे,
चल के फिर रिन्दगी कहाँ होगी।


हूँ तो सादामिज़ाज पर ’शिल्पी’,
फ़न में वो सादगी कहाँ होगी ।


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4. बैठे हैं क्यूं तनहा-तनहा :-

बैठे हैं क्यूं तनहा-तनहा।
मैं भी तो हूँ तनहा-तनहा।


पास चलूं क्या सोचेंगे वो,
बस ये सोचूँ तनहा-तनहा।


संबंधो में अरमानों का,
होता है खूँ तनहा-तनहा।


जो पाया सब जग जाहिर है,
खोकर ढूढूँ तनहा-तनहा।


मंजिल कितनी दूर अभी है,
पग-पग नापूँ तनहा-तनहा।


सारे साथी भूखे होंगे,
कैसे खालूँ तनहा-तनहा।


रिश्ते सबके आगे-पीछे,
किसको मानूँ तनहा-तनहा।


तोड़ के बन्धन हर रिश्ते का,
जाते हैं यूँ तनहा-तनहा।


दर्द बुतों का सुनने वाला,
’शिल्पी’ है तू तनहा-तनहा।


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5. गीत/ देते रहना प्यार सभी को :-

देते रहना प्यार सभी को,
लेते रहना प्यार सभी से

 करके देखो खूब मिलेगी,
इज्जत तुमको यार सभी से।

जिसकी कद्र करोगे तुम,
निश्चित वह कद्र करेगा।
प्यार कदाचित जिसको दोगे,
तुमको भद्र कदेगा।
थोडी़ सी खुदगर्जी आई,
पाओगे धिक्कर सभी से.............

खरी बात खोटी कहलाती,
लगती बहुत बुरी है।
स्वाभिमान पर ठेस लगे और,
दिल पे चले छुरी है।
मीठी बोली बोलोगे तो,
लूटोगे सत्कार सभी से.....

दुनिया वाले इक दूजे से,
रखते खूब अपेक्षा।
प्रतिफल अच्छा नहीं मिला तो,
करते खूब उपेक्षा।
करो समीक्षा,पुनः प्रतीक्षा,
कहता समय पुकार सभी से......

सींग,नुकीले दंत और नख,
द्वन्द्व हेतु पाया हर प्राणी।
हर से मिली पृथक मानव को,
बुद्धि,जिह्वा,वाणी।
प्रतिद्वन्दी ’शिल्पी’ बहुतेरे,
रखना शुद्ध विचार सभी से........

Sunday, July 12, 2009

दिल का कहना जरूर माना करो

दिल का कहना जरूर माना करो।
ख़ुद को ख़ुद से ख़फ़ा किया ना करो।

चीज कोई जो तुमको पानी है ,
ख़ुद को उसके लिए दीवाना करो।

जब भला तुम किसी का कर न सको ,
तुम किसी का कभी बुरा ना करो।

आजमाते रहे हो जीवन भर,
बन्द अब ख़ुद को आजमाना करो।

झूठी तारीफ़ रूबरू जो करे,
उसको हमदर्द तुम न माना करो।

तुममें भी इक खु़दा तो रहता है,
तुम हमेशा खु़दा-खु़दा ना करो।