Sunday, August 30, 2009

बात करते हैं हम मुहब्बत की

बात करते हैं हम मुहब्बत की,और हम नफ़रतों में जीते हैं ।
खामियाँ गैर की बताते हैं ,खुद बुरी आदतों में जीते हैं ।

सबको आगे आगे जाना है,तेज रफ़्तार जिन्दगी की हुई;
भागते दौड़ते जमाने में, हम बडी़ फ़ुरसतों में जीते हैं ।

आज तो ग़म है बेबसी भी है,जिन्दगी कट रही है मुश्किल से;
आने वाला पल अच्छा होगा , हम इन्हीं हसरतों में जीते हैं ।

आज के दौर मे जीना है कठिन,और मरना बडा़ आसान हुआ;
कामयाबी बडी़ हमारी है , जो ऐसी हालतों में जीते हैं ।

मिट्टी लगती है जो भी चीज मिली,जो भी पाया नहीं वो सोना लगा; 
जो हमें चीज मिल नहीं सकती ,हम उन्हीं चाहतों में जीते हैं

कृपया बनारस के कवि/शायर, समकालीन ग़ज़ल [पत्रिका] में नई ग़ज़लें 
जरूर देंखे ... और टिप्पणी भी दें...

Friday, August 28, 2009

मुझे तनहाइयां भाती नहीं है

मुझे तनहाइयां भाती नहीं हैं। 
मैं तन्हा हूँ तू क्यों आती नहीं है।

तुझे ना देख लें जबतक ये नज़रें,
सुकूं पल भर भी ये पाती नहीं है।

गये हो दूर तुम जबसे यहाँ से,
बहारें भी यहाँ आती नहीं है।

तराने गूंजते थे कल तुम्हारे,
वहाँ कोयल भी अब गाती
नहीं है।

तुझे अपना बनाना चाहता था,
कसक दिल की अभी जाती
नहीं है।

शिकायत है यही किस्मत से अपने,
मुझे ये तुमसे मिलवाती
नहीं है।


कृपया बनारस के कवि/शाय,समकालीन ग़ज़ल [पत्रिका] में नई ग़ज़लें जरूर देंखे ...

Saturday, August 22, 2009

मंजिल को पाने की खातिर

मंजिल को पाने की खातिर , कोई राह बनानी होगी ।
दूर अंधेरे को करने को , कोई शमा जलानी होगी ।

अंगारों पर चलना होगा , काँटों पर सोना होगा ;
कितने ख्वाब तोड़ने होंगे , कितनी चाह मिटानी होगी ।

बस दो ही तो राहें अपने , इस जीवन में होती हैं ;
अच्छी राह चुनो तो अच्छा , बुरी राह नादानी होगी ।

इतना भी आसान नहीं है , मंजिल को यूँ पा लेना ;
कुछ पाने की खातिर तुमको , देनी कुछ कुर्बानी होगी।

लीक से हटकर चलना तो अच्छा है लेकिन मुश्किल है;
दिल का हौसला जारी रखोगे तो बड़ी आसानी होगी ।

पैदा होकर मर जाते हैं , जाने कितने लोग यहाँ ;
लेकिन नया करोगे कुछ तो , तेरी अमर कहानी होगी ।

दुनिया वाले कुछ बोलेंगे , जैसी उनकी आदत है;
लेकिन जब मंजिल पा लोगे , दुनिया पानी पानी होगी

Friday, August 21, 2009

बनारस में एक कवि गोष्ठी

दिनांक 20-08-09 को वाराणसी में नई दिल्ली से पधारे श्री अमित दहिया ‘बादशाह’,कुलदीप खन्ना,सुश्री शिखा खन्ना,विकास आदि की उपस्थिति में श्री उमाशंकर चतुर्वेदी‘कंचन’ के निवास स्थान पर एक काव्य-गोष्ठी का आयोजन हुआ जिसमें इनके और मेरे अतिरिक्त देवेन्द्र पाण्डेय,नागेश शाण्डिल्य,विन्ध्याचल पाण्डेय, ,शिवशंकर ‘बाबा’,अख्तर बनारसी आदि कवि मित्रों ने भाग लेकर काव्य-गोष्ठी को एक ऊचाँई प्रदान की।प्रस्तुत काव्य-गोष्ठी के कुछ चित्र मेरे ब्लॉग 'कुछ हमसे सुनो कुछ हमसे कहो' पर देंखे ....

कुलदीप खन्ना,देवेन्द्र पांडे,अमित दहिया'बादशाह' उमाशंकर चतुर्वेदी'कंचन'














शिखा खन्ना और विकास















उमाशंकर चतुर्वेदी'कंचन',विंध्याचल पाण्डेय,प्रसन्न वदन चतुर्वेदी और शिवशंकर 'बाबा'














शिखा खन्ना और विकास













































कुलदीप खन्ना,देवेन्द्र पांडे,














देवेन्द्र पांडे,अमित दहिया'बादशाह'















Friday, August 14, 2009

है कठिन इस जिंदगी के हादसों को

है कठिन इस जिंदगी के हादसों को रोकना ।
मुस्कराहट रोकना या आसुओं को रोकना ।

वक्त कैसा आएगा आगे न जाने ये कोई ,
इसलिए मुश्किल है शायद मुश्किलों को रोकना ।

मंजिलों की ओर जाने के लिए हैं रास्ते,
इसलिए मुमकिन नहीं है रास्तों को रोकना ।

इनको होना था तभी तो हो गए होते गए ,
चाहते तो हम भी थे इन फासलों को रोकना ।

दोस्तों के रूप में अक्सर छुपे रहते हैं ये,
इसलिये आसां नहीं है दुश्मनों को रोकना ।

भजन/दर्शन दो प्रभु कबसे खड़े हैं

आज श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के शुभ अवसर पर मैं अपना लिखा एक भजन प्रस्तुत कर रहा हूँ.....

दर्शन दो प्रभु कबसे खड़े हैं।
हम भारी विपदा में पड़े हैं।

कोई नहीं प्रभु-सा रखवाला,
मेरे कष्ट मिटाने वाला,
जीवन में कर दीजै उजाला;
आप दयालू नाथ बड़े हैं.......

झूठी माया झूठी काया,
लेकर मैं दुनिया में आया,
दुनिया में है पाप समाया;
भरते पाप के रोज़ घड़े हैं........

पाप हटे मिट जाये बुराई,
सबमें पडे़ प्रभु आप दिखाई,
इच्छाओं ने दौड़ लगाई;
कितनी गहरी मन की जड़े है.......

Sunday, August 9, 2009

बनारस के कवि और शायर/रामदास अकेला

बनारस के शायर की अगली कडी़ में रामदास अकेला जी की रचनाएं प्रस्तुत हैं।आप की जन्मतिथि है २४-०३-१९४२|जन्मतिथि है-ग्राम-लखनेपुर,पो०-घनश्यामपुर जिला-जौनपुर| आप के पिता का नाम है- स्व० बलीराम भगत।आप प्रवर अधीक्षक [डाक विभाग] के पद से सेवा निवृत्त होकर साहित्य सेवा में संलग्न है।गीत,ग़ज़ल,मुक्तक एवं नवगीतों की रचना आप को विशेष रूप से पसन्द है।आप द्वारा रचित ‘आईने बोलते हैं’ ग़ज़ल संग्रह 1999 में प्रकाशित।आप की बहुत सी रचनाएं दूरदर्शन और आकाशवाणी पर प्रसारित हो चुकी हैं।आप अदबी-संगम[हिन्दी-उर्दू साहित्यिक संस्था]वाराणसी के अध्यक्ष तथा प्रगतिशील लेखक संघ के उपाध्यक्ष भी हैं।

1. कैसे-कैसे इसे गुजारी है :-

कैसे-कैसे इसे गुजारी है।
ज़िन्दगी यार फिर भी प्यारी है।

मालोज़र की कोई कमी तो नही,
हाँ मगर प्यार की दुश्वारी है।

ज़िन्दगी कौन कब तलक ढोता,
ये तो खु़द मौत की सवारी है।

बाप मरता तो भला कैसे वो,
जिसकी बेटी अभी कुँवारी है।

भार से डालियों के टूट रहे,
ये दरख्तों की अदाकारी है।

ये तो गुज़री है नींद में यारों,
भरम रहा कि शब्बेदारी है।

होश में कैसे ’अकेला’ रहता,
होशवालों में मारामारी है।


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2. ज़िन्दगी के वास्ते क्या-क्या है :-

ज़िन्दगी के वास्ते क्या-क्या है करता आदमी।
अपनी ही परछाइयों से डर के मरता आदमी।

अपने हक़ में कोई भी तामीर क्या कर पायेगा,
खण्डहरों की ईंट सा खुद ही बिखरता आदमी।

रख दिया है आईना जबसे सड़क के बीच में,
मुँह बनाता फेरकर चेहरा बनाता आदमी।

रंग, नस्लों, धर्म,मज़हब जातियां दर जातियां,
अनगिनत फिरकों में जुड़ता और बिखरता आदमी।

थे ज़मीं था आसमां परवाज में इसके कभी,
परकटे पंछी सा है अब फड़फडा़ता आदमी।

दावतों के बाद जूठन फेंक देता जब कोई,
ढेर पर कुडे़ के चुन कर पेट भरता आदमी।

किस कदर नाराज़ लगता है ये अपने आप से,
बुदबुदाता फिर रहा है पागलों सा आदमी।

ज़िन्दगी भर दूसरों की फ़िक्र में उलझा रहा,
अपने बारे में कभी कुछ फ़िक्र करता आदमी।

एक मुट्ठी खा़क पर करता रहा इतना गुमान,
काश मिट्टी की हकी़क़त को समझता आदमी।

अपनी इक पहचान तो इसको बनानी चाहिए,
काफ़िले के साथ हो या हो अकेला आदमी।


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3.बोलियाँ अब न भाषाएं वही :-

बोलियाँ अब न भाषाएं वही।
कब तलक गायेंगे गाथाएं वही।

कारवां लेकर हमारा चल पडे़,
जो खडी़ करते हैं बाधाएं वही।

आँख के अन्धे हैं लेकिन लिख रहे,
कौम के माथे की रेखाएं वही।

हम रहे अब भी लकीरों के फकीर,
तोड़ते अक्सर हैं सीमाएं वही।

अस्मिता जिनसे वतन की दावं पर,
हाय वन्देमातरम गाएं वही।

चीखते हैं जो धरम के नाम पर,
नफ़रतों की आग भड़काएं वही।

हाथ में लेकर चले हो आईना,
देखना पत्थर न फिर आएं वही।

चल ‘अकेला’कुछ नई बातें करें,
मत सुनाना फिर से कविताएं वही।

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4. चढ़ तो गये ऊँचाइयों पे धूमधाम से :-

चढ़ तो गये ऊँचाइयों पे धूमधाम से।
बदली नज़र तो गिर पडे़ औंधे धडा़म से।

करता रहा सलाम,कभी झुक के दूर से,
करने लगा है बात वही तुम-तडा़म से।

बदले हुए मौसम की ये तासीर खूब है,
मेढक भी परेशान है सर्दी-जु़काम से।

हाथों से निकल तोते बहुत दूर उड़ गये,
रखा था जिन्हें हमने बहुत एहतेमाम से।

औरों के हाल पर तो हँसे भूल क्यूँ गये,
तुमको भी गुजरना है कभी उस मुकाम से।

गुम होके रह गया है इसी भीड़ में कहीं,
निकला तो ‘अकेला’ था किसी और काम से।


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5. संसद से सड़कों तक देखा :-

संसद से सड़कों तक देखा सब उद्योग लगे।
बेकारी से फिर भी जूझते हमको लोग लगे।

खुद क्या थे,क्या हैं,क्या होंगे;क्या मालूम उन्हें,
औरों का कद छोता करने में जो लोग लगे।

वो क्या जाने भूख की शिद्दत कीमत रोटी की,
भक्तों के आटा-घी से ही जिनका भोग लगे।

हम खोये रहते तलाश में जीवन भर जिसकी,
उनकी नज़र में एक समाधी और संभोग लगे।

ईर्ष्या,द्वेष,अहं और नफरत,लालच,बेइमानी;
एक बेचारे मन को जाने कितने रोग लगे।

तनहाई में यूँ ही अकेला भटकेगा कब तक,
साथ तुम्हारे लोग भी आयें कब संयोग लगे।