Sunday, October 26, 2014

श्री रामदरश मिश्र जी की एक कविता/कंचनलता चतुर्वेदी

मित्रों ! मैं आज से एक नै शुरुआत कर रहा हूँ | वह है- पुराने रचनाकारों की रचनाओं को कवितापाठ के जरिये आपतक पहुँचाना | इस क्रम में श्री रामदरश मिश्र जी की कविता श्रीमती कंचनलता चतुर्वेदी के स्वर में प्रस्तुत कर रहा हूँ | आशा है पुराने रचनाकारों को सम्मान देने का यह तरीका आपको जरूर पसंद आयेगा |इस रचना का वास्तविक आनंद Youtube पर सुन कर ही आयेगा, इसलिए आपसे अनुरोध है कि आप मेरी मेहनत को सफल बनाएं और वहां इसे जरूर सुनें...
 

आंधियाँ भी चले और दिया भी जले

मित्रों ! एक रचना अपनी आवाज़ में  प्रस्तुत कर रहा हूँ, आशा है आप को अवश्य पसंद आयेगी...
इस रचना का वास्तविक आनंद Youtube पर सुन कर ही आयेगा, इसलिए आपसे अनुरोध है कि आप मेरी मेहनत को सफल बनाएं और वहां इसे जरूर सुनें...


आंधियाँ भी चले और दिया भी जले ।
होगा कैसे भला आसमां के तले ।

अब भरोसा करें भी तो किस पर करें,
अब तो अपना ही साया हमें ही छले ।

दिन में आदर्श की बात हमसे करे,
वो बने भेड़िया ख़ुद जंहा दिन ढले ।

आवरण सा चढ़ा है सभी पर कोई,
और भीतर से सारे हुए खोखले ।

ज़िन्दगी की खुशी बांटने से बढ़े ,
तो सभी के दिलों में हैं क्यों फासले ।

कुछ बुरा कुछ भला है सभी को मिला ,
दूसरे की कोई बात फ़िर क्यों खले ।


कृपया आप यहाँ अवश्य पधारें :-

श्री रामदरश मिश्र जी की एक कविता/कंचनलता चतुर्वेदी

Sunday, October 12, 2014

बड़ी मुश्किल है बोलो क्या बताएं...

अपनी आवाज़ में एक ग़ज़ल [ "मुफ़ाईलुन मुफ़ाईलुन फ़ऊलुन" पर आधारित ] प्रस्तुत कर रहा हूँ...
इस रचना का वास्तविक आनंद Youtube पर सुन कर ही आयेगा, इसलिए आपसे अनुरोध है कि आप मेरी मेहनत को सफल बनाएं और वहां इसे जरूर सुनें...

  
बड़ी मुश्किल है बोलो क्या बताएं
न पूछो कैसे हम जीवन बिताएं।


अदाकारी हमें आती नही है,
ग़मों में कैसे अब हम मुस्कुराएं।


अँधेरा ऐसा है दिखता नही कुछ,
चिरागों को जलाएं या बुझाएं।


फ़रेबों,जालसाजी का हुनर ये,
भला खुद को ही हम कैसे सिखाएं।


ये माना मुश्किलों की ये घडी़ है,
चलो उम्मीद हम फिर भी लगाएं।


सियासत अब यही तो रह गई है,
विरोधी को चलो नीचा दिखाएं।


अगर सच बोल दें तो सब खफ़ा हों,
बनें झूठा तो अपना दिल दुखाएं।