Sunday, September 13, 2009

कैसे कह दें प्यार नहीं है

अब कुछ प्यार की बात भी हो जाए...है न...

कैसे कह दें प्यार नहीं है।
हम पत्थरदिल यार नहीं हैं।

अपनी बस इतनी मजबूरी,
होता बस इज़हार नहीं है।

मिलने का कुछ कारण होगा,
ये मिलना बेकार नहीं है।

तुम मुझको अच्छे लगते हो,
अब इससे इनकार नहीं है।

कुछ लोगों से मन मिलता है,
इससे क्या गर यार नहीं हैं।

तुम फूलों सी नाजुक हो तो,
हम भौरें हैं खा़र नहीं है।

क्या मेरे दिल में रह लोगे,
बंगला,मोटरकार नहीं है।

तनहा-तनहा जीना मुश्किल,
संग तेरे दुश्वार नहीं है।

हुश्न की नैया डूबी-डूबी,
इश्क अगर पतवार नहीं है।

मैं तबतक साधू रहता हूँ,
जबतक आँखें चार नहीं हैं ।


कृपया बनारस के कवि/शायर,समकालीन ग़ज़ल [पत्रिका] में नई ग़ज़लें जरूर देंखे ...और टिप्पणी भी दें...

45 comments:

  1. बहुत खुब, बहुत हू सुन्दर रचना। लाजवाब। बधाई

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  2. aakhri sher khas taur se achchha laga...waah!

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  3. सभी शेर लाजवाब हैं बधाई।

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  4. सुन्दर रचना .. | अंतिल पंगती तो कमाल का लिखा है |

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  5. कितनी खूबसूरत भीनी-भीनी सी खुशबूदार ग़ज़ल..एक-एक शेर लाजवाब..फूल से कोमल और सजीले अहसासों को अश’आरों की पनाह मे लाये हैं आप..बधाई

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  6. यह शेर खास लगे..

    कैसे कह दें प्यार नहीं है।
    हम पत्थरदिल यार नहीं हैं।

    अपनी बस इतनी मजबूरी,
    होता बस इज़हार नहीं है।


    क्या मेरे दिल में रह लोगे,
    बंगला,मोटरकार नहीं है।

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  7. रचना बेहद प्यारी लगी . आनंद आ गया बधाई .

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  8. shabdo ka chayan bahut sundar hai...ese saadhu vaad ko namaskar...

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  9. सरल सहज शब्दों में प्रेम भाव और किंचित भय को भी को प्रस्तुत कर दिया है ..
    बहुत शुभकामनायें ..!!

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  10. क्या कहने है भाई प्रसन्न वादन जी .तभी तक साधू हूँ जब तक आँखे चार नहीं है ,मज़ा आगया ,आपकी इस बात से मैं साधू नहीं हूँ तो भी मज़ा आया और साधू होता तो भी मज़ा आता |हम भवरे हैं खार नहीं है ,हमारे पास बंगला मोटरकार नहीं है ,फिर भी पत्थर दिल नहीं है ,अरे ! ये तो व्यंग्य हो गया | अपनी बस इतनी {मजबूरी }{कमजोरी }होता बस इजहार नहीं है | बहुत सादा सुंदर और ....रचना |

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  11. बहुत अच्छी गज़ल
    यह शेर तो वर्षों तक लोगों के अधरों पर राज करेगा---
    मैं तब तक साधू रहता हूँ
    जब तक आँखें चार नहीं है।
    --बधाई ।
    ००००देवेन्द्र पाण्डेय।

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  12. shukria.

    banaaras ke kavi. samkaleen gazal aur aapki gazalein sabhi qaabile-taareef hain.

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  13. yah aap ne achchha kiya ki ek hi blog par apni sabhi rachnaon ko le aaye.

    अपनी बस इतनी मजबूरी,
    होता बस इज़हार नहीं है।
    lekin-
    bahut hi sundar tareeke se izhaaar is gazal mein kar hi diya.
    -sundar saral lay mein bahati gazal.

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  14. मैं तब तक साधू रहता हूँ
    जब तक आँखें चार नहीं है।

    प्रसन्न जी, तबियत खुश कर दी आपने तो ज़माने को ज़माने की सच्चाई बता कर.
    छोटे बहर की बेहतरीन ग़ज़ल.

    हार्दिक बधाई.

    चन्द्र मोहन गुप्त
    जयपुर
    www.cmgupta.blogspot.com

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  15. अपनी बस इतनी मजबूरी,
    होता बस इज़हार नहीं है.........

    KHOOBSOORAT GAZAL AUR MAASOOM SA IZHAAR ... KYA KHOOB LIKHA HAI ... BADHAAI

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  16. सहज सरल शब्दों में गहन अभिव्यक्ति की कविता !

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  17. Aapke sabhee gazlon/nagmon me ek zabadast kashish hai!

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  18. मैं तब तक साधू रहता हूँ
    जब तक आँखें चार नहीं है।
    ... bahut khoob !!!!

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  19. khubsurat ehsaas hain jinh aapne shabd diye hain........

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  20. कुछ लोगों से मन मिलता है,
    इससे क्या गर यार नहीं हैं।

    बहुत अच्छा शेर लगा बधाई!!

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  21. शुरू से अंत तक वो लय आपने कायम रखी।

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  22. उसके बिन सब सूना है
    गीतों में झंकार नहीं है

    बिन उसके जो बज उठता
    मन वीणा का तार नहीं है

    उल्टा सीधा लिख देता है
    कोई रचनाकार नहीं है

    वो जो पढ़ के हंस देती
    तो तुकबंदी बेकार नहीं है

    आपकी गजल तो हमारे मन को भी छू गयी..पढ़ते पढ़ते ही चार पंक्तिया लय में आगई तो आपको टिप्पणी के माध्यम से समर्पित है..बहुत अच्छी रचना ..मन के भावो को जागृत करने वाली...

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  23. सहज और सुंदर अभिव्यक्ति...
    काफ़ी संभावनाएं हैं...

    शुक्रिया....

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  24. सबसे पहले, मै इतनी सुंदर रचना के लिए बधाई दूंगा। महज इस रचना के लिए ही नही बल्कि सारी रचनायें लाजवाब है। मेरी सुभकामनाये आपकी आनेवाली रचनाओं के लिए भी है।

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  25. एक अनूठी ग़ज़ल चतुर्वेदी जी...

    आखिरी शेर के अंदाज़े-बयां ने मन मोह लिया!

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  26. prasnn ji man prasnn ho gaya padhkar .aakhri line vyang ki put liye bhi nazar aai .poori rachana mazedar rahi .

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  27. कैसे कह दें प्यार नहीं है।
    हम पत्थरदिल यार नहीं हैं।



    shukria

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  28. Ye aachcha kiya aapne ..thoda mushkil hota hai kaii blogs open karne main....

    क्या मेरे दिल में रह लोगे,
    बंगला,मोटरकार नहीं है।

    तनहा-तनहा जीना मुश्किल,
    संग तेरे दुश्वार नहीं है।
    Bahut sundar dil se nikle bhav..!!!

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  29. क्या मेरे दिल में रह लोगे,
    बंगला,मोटरकार नहीं है।

    शायरी को नए मुकाम तक पहुँचाने में आप जो प्रयास कर रहे हैं वो कबीले दाद है...बहुत अच्छी ग़ज़ल है और जो आपने प्रयोग किये हैं वो इसे और भी खूबसूरत बना रहे हैं...वाह.
    नीरज

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  30. अच्छी लगी,.सीधी उतरती हुई.

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  31. क्या मेरे दिल में रह लोगे,
    बंगला,मोटरकार नहीं है।

    मैं तबतक साधू रहता हूँ,
    जबतक आँखें चार नहीं हैं ।

    अद्भुत पंक्तियाँ. आनंदमयी.
    आभार

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  32. मैं तबतक साधू रहता हूँ,
    जबतक आँखें चार नहीं हैं ।
    बहुत खूब -- क्या बात कह दी.
    बहुत प्यारी रचना

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  33. बहुत उम्दा रचना है. बहुत पसंद आई.

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  34. बहुत खूब्।आपका ब्लाग खोलने पर पेज नही खुल रहा है, चेक कर लिजिये प्लीज़्।

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  35. मैं तब तक साधू रहता हूँ
    जब तक आँखें चार नहीं है।

    मुझे ये तो बहुत पसन्द आई. बधाई.

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  36. पंडित जी
    सच बेहतरीन रचना है
    साधु-साधु

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  37. आंखें चार होते ही साधू से बन जाओगे स्‍वादु

    हमको आपको ऐसी मुमकिन लगती दरकार नहीं है

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