Sunday, October 26, 2014

आंधियाँ भी चले और दिया भी जले

मित्रों ! एक रचना अपनी आवाज़ में  प्रस्तुत कर रहा हूँ, आशा है आप को अवश्य पसंद आयेगी...
इस रचना का वास्तविक आनंद Youtube पर सुन कर ही आयेगा, इसलिए आपसे अनुरोध है कि आप मेरी मेहनत को सफल बनाएं और वहां इसे जरूर सुनें...


आंधियाँ भी चले और दिया भी जले ।
होगा कैसे भला आसमां के तले ।

अब भरोसा करें भी तो किस पर करें,
अब तो अपना ही साया हमें ही छले ।

दिन में आदर्श की बात हमसे करे,
वो बने भेड़िया ख़ुद जंहा दिन ढले ।

आवरण सा चढ़ा है सभी पर कोई,
और भीतर से सारे हुए खोखले ।

ज़िन्दगी की खुशी बांटने से बढ़े ,
तो सभी के दिलों में हैं क्यों फासले ।

कुछ बुरा कुछ भला है सभी को मिला ,
दूसरे की कोई बात फ़िर क्यों खले ।


कृपया आप यहाँ अवश्य पधारें :-

श्री रामदरश मिश्र जी की एक कविता/कंचनलता चतुर्वेदी