बुधवार, 6 अप्रैल 2022
गुरुवार, 11 नवंबर 2021
बढ़े हम फासलों तक जा रहे हैं
बढ़े हम फासलों तक जा रहे हैं |
हंसी से आंसुओं तक जा रहे हैं |
सभी हैं दोस्त, ये जो काफिला है,
हमारे दुश्मनों तक जा रहे हैं |
बहन, भाई के
रिश्ते बचपनों तक,
बड़े, न्यायालयों
तक जा रहे हैं |
मुहब्बत दिल का रिश्ता अब नहीं है,
सभी अब बिस्तरों तक जा रहे हैं |
मतलबी लोग सारे हो गए हैं,
वो केवल दावतों तक जा रहे हैं |
गिरावट आ रही है आदमी में,
भले ग्रह-उपग्रहों
तक जा रहे हैं |
न पाठक आ रहे हैं पुस्तकों तक,
न लेखक अब दिलों तक जा रहे हैं |
पुरानी बात है बाजार जाना,
वो खुद चलकर घरों तक जा रहे हैं |
नहीं अंतर है इनमें, मसखरों में,
ये कवि अब चुटकुलों तक जा रहे हैं |
खबर अच्छी कहीं कोई न मिलती,
नगर बस हादसों तक जा रहे हैं |
न गाँवों में दिखे पहले सी रौनक,
शहर की आदतों तक जा रहे हैं |
ज़रा सा शेर कह सोचें ‘अनघ’ वो,
कि हम भी गालिबों तक जा रहे हैं |
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गुरुवार, 14 अक्टूबर 2021
बिना इंसानियत इन्सान सच्चा हो नहीं सकता
बिना इंसानियत इन्सान सच्चा हो नहीं सकता |
हुआ अपना नहीं जो वो किसी का हो नहीं सकता |
अगर तुलना करें इक घाव की पाया जो गैरों से,
मिला अपनों से उससे तो वो गहरा हो नहीं सकता |
यही हम सोचते अक्सर जो अनहोनी कभी होती,
सरासर झूठ है ये बात, ऐसा हो नहीं सकता |
हमेशा लील जाते हैं बड़े अपनों से छोटों को,
गिरा सागर में दरिया तो वो दरिया हो नहीं सकता |
हुए जब भी अलग माँ-बाप बच्चे पर बुरी बीती,
पिता का हो नहीं सकता या माँ का हो नहीं सकता |
जगह दिल में किसी के भी बड़ी मुश्किल से बनती है,
अगर दिल टूट जाए फिर भरोसा हो नहीं सकता |
न मानो तुम भले लेकिन सही ये बात है तो है,
गलत मंजिल अगर हो ठीक रस्ता हो नहीं सकता |
दिलों को जीत सकते हैं, पिघल सकते हैं पत्थर भी,
मुहब्बत की जुबां से ये कहो क्या हो नहीं सकता |
कमी तो दौलतों की रौशनी में हो भी सकती है,
अगर हो इल्म की दौलत, अँधेरा हो नहीं सकता |
सितारे अब कहे जाते यहाँ मशहूर कुछ चेहरे,
मगर जो रौशनी ना दे सितारा हो नहीं सकता |
सभी के वास्ते भगवान ने सौंपी अलग नेमत,
जो तेरा है वो तेरा है, ‘अनघ’ का हो नहीं सकता |
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शुक्रवार, 10 सितंबर 2021
न्यायालय में न्याय नहीं है
न्यायालय में न्याय नहीं है |
दूजा और उपाय नहीं है |
मत बाँधो इसको खूंटे से,
बेटी है ये गाय नहीं है |
मोमबत्तियां जला रहे हैं,
न्याय भरा समुदाय नहीं है |
निर्भयता से बेटी रह ले,
ऐसी एक सराय नहीं है |
नेताओं की पुस्तक में क्यों,
सच जैसा अध्याय नहीं है |
दौलत नित बढ़ती पर कहते,
राजनीति व्यवसाय नहीं है |
खर्चे पर खर्चे करते हैं,
लेकिन कोई आय नहीं है |
सच, ईमान जहाँ सब सीखें,
जग में वो संकाय नहीं है |
अपराधी फल-फूल रहे हैं,
क्या अब लगती हाय नहीं है ?
जब अखबार नहीं; लगता है,
आज सुबह की चाय नहीं है |
जयचन्दों से देश भरा है,
कोई पन्ना-धाय नहीं है |
प्रतिभाओं का वंचित रहना,
क्या ये भी अन्याय नहीं है ?
तेरी-मेरी, इसकी-उसकी,
मिलती ‘अनघ’ क्यों राय नहीं है |
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