Sunday, July 5, 2009

बडी़ मुश्किल है बोलो क्या बताएं

एक नई ग़ज़ल ["मुफ़ाईलुन मुफ़ाईलुन फ़ऊलुन"पर आधारित] प्रस्तुत कर रहा हूँ...

बड़ी
मुश्किल है बोलो क्या बताएं

पूछो कैसे हम जीवन बिताएं।

अदाकारी हमें आती नही है,
ग़मों में कैसे अब हम मुस्कुराएं।

अँधेरा ऐसा है दिखता नही कुछ,
चिरागों को जलाएं या बुझाएं।

फ़रेबों,जालसाजी का हुनर ये,
भला खुद को ही हम कैसे सिखाएं।

ये माना मुश्किलों की ये घडी़ है,
चलो उम्मीद हम फिर भी लगाएं।

सियासत अब यही तो रह गई है,
विरोधी को चलो नीचा दिखाएं।

अगर सच बोल दें तो सब खफ़ा हों,
बनें झूठा तो अपना दिल दुखाएं।

11 comments:

  1. बड़ी सकारात्मक सोच का शेर है.

    ये माना मुश्किलों की ये घडी़ है,
    चलो उम्मीद हम फिर भी लगाएं।
    ग़ज़ल अच्छी है.
    - विजय

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  2. अँधेरा ऐसा है दिखता नही कुछ,
    चिरागों को जलाएं या बुझाएं।

    ACCHI METERIC GHAZAL...

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  3. simple way me kaafi saari baatein

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  4. अदाकारी हमें आती नही है,
    ग़मों में कैसे अब हम मुस्कुराएं।

    लाजवाब शेर है............ poori ग़ज़ल खूबसूरत........... mahaktaa huva ehsaas है

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  5. वाह इतना शानदार, ख़ूबसूरत और लाजवाब ग़ज़ल लिखा है आपने कि कहने के लिए अल्फाज़ कम पर गए!

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  6. अदाकारी हमें आती नही है,
    ग़मों में कैसे अब हम मुस्कुराएं।
    प्रसन्नजी वदन चतुर्वेदी! बडा अच्छा लगा जब आप हे प्रभु पर पधारे।
    आपकी यह कविताओ की दो लाईनो मे मुझे अपनत्व लगा।

    हार्दिक मगलभावनाओ सहीत
    आभार
    मुम्बई टाईगर
    हे प्रभु यह तेरापन्थ

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  7. अँधेरा ऐसा है दिखता नही कुछ,
    चिरागों को जलाएं या बुझाएं।

    Umda gazal !

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  8. अदाकारी हमें आती नही है,
    ग़मों में कैसे अब हम मुस्कुराएं।

    वाह वाह...क्या शेर कहा है...पूरी ग़ज़ल ही बेहद असरदार है...बधाई...
    नीरज

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  9. आखिरी शेर खूब भाया !

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  10. आपकी सारी ग़ज़लें बहुत खूबसूरत हैं

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