रविवार, 16 मार्च 2014

हास्यकविता/ जोरू का गुलाम

     मित्रों ! होली के अवसर पर एक हास्य - कविता का आडियो प्रस्तुत कर रहा हूँ | मजे की बात ये है कि ये रचना मैंने उस समय लिखी थी जब अभी मेरी शादी नहीं हुई थी | आशा है आप को ये जरूर पसंद आयेगी.....
                        आप सभी को होली की शुभकामनाएं...
      इस रचना का असली आनंद सुन कर ही आयेगा, इसलिए आपसे अनुरोध है कि नीचे दिए गए लिंक पर इसे जरूर सुनें | आप से अनुरोध है कि आप मेरे Youtube के Channel पर भी Subscribe और Like करने का कष्ट करें...

भयवश नहीं परिस्थितिवश मैं करता हूँ सब काम।
फ़िर भी लोग मुझे कहते हैं जोरू का गुलाम.......।

सुबह अगर बीबी सोई हो, चाय बनाना ही होगा;
बनी चाय जब पीने को तब उसे जगाना ही होगा;
चाय बनाना शौक है मेरा हो सुबह या शाम.......
फ़िर भी लोग मुझे कहते हैं जोरू का गुलाम.......।

मूड नहीं अच्छा बीबी का फ़िर पति का फ़र्ज है क्या;
बना ही लेंगे खाना भी हम आखिर इसमें हर्ज है क्या;
इसी तरह अपनी बीबी को देता हूँ आराम.....
फ़िर भी लोग मुझे कहते हैं जोरू का गुलाम.......।

वो मेरी अर्धांगिनी है इसमें कोई क्या शक है;
इसीलिये तनख्वाह पे मेरे केवल उसका ही हक है;
मेरा काम कमाना है बस खर्चा उसका काम.....
फ़िर भी लोग मुझे कहते हैं जोरू का गुलाम.......। 
Copyright@PBChaturvedi
                          आप सभी को होली की शुभकामनाएं...

सोमवार, 6 जनवरी 2014

A love song-कुछ हमसे सुनो कुछ हमसे कहो

मित्रों ! नववर्ष की पहली सौगात के रूप में यह प्रेमगीत प्रस्तुत कर रहा हूँ | आशा है हमेशा की तरह आप इसे भी पसंद करेंगे.....
इस रचना का असली आनंद Youtube पर सुन कर ही आयेगा, इसलिए आपसे अनुरोध है की आप मेरी मेहनत को सफल बनाएं और वहां इसे जरूर सुनें...

कुछ हमसे सुनो कुछ हमसे कहो।
चाँदनी रात है, ऐसे चुप ना रहो। 


हर जगह भीड़ है हर जगह लोग हैं,
ऐसी तनहाई मिलती है जल्दी नहीं;
जहाँ कोई न हो जहाँ कोई न हो........
चाँदनी रात है, ऐसे चुप ना रहो.........


बडी़ मुश्किल से फ़ुरसत के पल आते हैं,
होके चुप इन पलों को न जाया करो;
प्यार के इस समुन्दर में आओ बहो......
चाँदनी रात है, ऐसे चुप ना रहो...........


लब अगर बात करने से कतरा रहे,
बात करने की तरकीब यूं सीख लो;
अपनी नज़रों से मेरी नज़र में कहो......
चाँदनी रात है, ऐसे चुप ना रहो............
Copyright@PBChaturvedi

अगर गीत पसंद आया तो यूट्यूब पर मुझे जरूर Subscribe और Like करें...

रविवार, 29 दिसंबर 2013

एक प्यार भरा नग़मा- तुमसे कोई गिला नहीं है

आज एक प्यार और दर्द भरी रचना आप के सामने प्रस्तुत है | इस रचना का संगीत-संयोजन भी मैंने किया है |   इस रचना का असली आनंद सुन कर ही आयेगा, इसलिए आपसे अनुरोध है की आप मेरी मेहनत को सफल बनाएं और नीचे दिए गए लिंक पर इसे जरूर सुनें... 
 आप सभी को नववर्ष की हार्दिक शुभकामनाएं...
आप से अनुरोध है कि आप मेरे Youtube के Channel पर भी Subscribe और Like करने का कष्ट करें ताकि आप मेरी ऐसी रचनाएं पुन: देख और सुन सकें | आशा ही नहीं वरन पूर्ण विश्वास है कि आप इस रचना को अवश्य पसंद करेंगे | रिकार्डिंग कर लेने के बाद उच्चारण संबंधी कुछ त्रुटियों की ओर भी  ध्यान गया पर दुबारा रिकार्डिंग करने के बजाय मैंने उसी तरह पोस्ट कर दिया | दरअसल अकेले गायन,वादन, रिकार्डिंग आदि कई काम एक साथ करते समय कई चीजें उस समय ध्यान में नहीं आ पाती, आगे से ध्यान रखूंगा |
              
केवल AUDIO सुनने  के लिए नीचे क्लिक करें-

तुमसे कोई गिला नहीं है।
प्यार हमेशा मिला नहीं है।

कांटे रहते उगे चमन में,
फूल हमेशा खिला नहीं है।

जिसको मंज़िल मिले हमेशा,
ऐसा हर काफ़िला नहीं है।

होता आया कई सदी से,,
ये पहला सिलसिला नहीं है।

बस अनचाही मिली हमें शय,
जो चाहा वो मिला नहीं है।

समझोगे तुम नहीं कभी भी,
नफ़रत दिल का सिला नहीं है।

जब तक मर्जी नहीं है रब की,

पत्ता तक इक हिला नहीं है |


नाजुक है दिल ‘अनघ’ हमारा,
ये पत्थर का किला नहीं है।
Copyright@PBChaturvedi
आप सभी को नववर्ष की हार्दिक शुभकामनाएं..

रविवार, 8 दिसंबर 2013

ग़ज़ल-जा रहा है जिधर बेखबर आदमी

      मित्रों ! आज मैं एक अपनी शुरुआती दौर की ग़ज़ल अपनी आवाज़ में प्रस्तुत कर रहा हूँ | इसी रचना से मैंने अपने ब्लॉग की शुरुआत की थी | इस रचना का संगीत-संयोजन भी मैंने किया है | आप से अनुरोध है कि आप मेरे Youtube के Channel पर भी Subscribe और Like करने का कष्ट करें ताकि आप मेरी ऐसी रचनाएं पुन: देख और सुन सकें | आशा ही नहीं वरन पूर्ण विश्वास है कि आप इस रचना को अवश्य पसंद करेंगे |
इस रचना का असली आनंद Youtube पर सुन कर ही आयेगा, इसलिए आपसे अनुरोध है कि आप मेरी मेहनत को सफल बनाएं और वहां इसे जरूर सुनें...



जा रहा है जिधर बेखबर आदमी ।
वो नहीं मंजिलों की डगर आदमी ।


उसके मन में है हैवान बैठा हुआ,
आ रहा है हमें जो नज़र आदमी ।


नफरतों की हुकूमत बढ़ी इस कदर,
आदमी जल रहा देखकर आदमी ।


दोस्त पर भी भरोसा नहीं रह गया,
आ गया है ये किस मोड़ पर आदमी ।


क्या करेगा ये दौलत मरने के बाद,
मुझको इतना बता सोचकर आदमी ।


इस जहाँ में तू चाहे किसी से न डर ,
अपने दिल की अदालत से डर आदमी । 


 हर बुराई सुराखें है इस नाव की,
जिन्दगी नाव है नाव पर आदमी ।
 

आदमी है तो कुछ आदमीयत भी रख,
गैर का गम भी महसूस कर आदमी ।


तू समझदार है ना कहीं और जा,
ख़ुद से ही ख़ुद कभी बात कर आदमी ।
Copyright@PBChaturvedi

मंगलवार, 26 नवंबर 2013

अमर गायक मुकेश और मेरा संगीत

         दोस्तों ! मैं प्रारम्भ से ही मुकेश का बहुत बड़ा प्रशंसक रहा हूँ | बल्कि ये कहिये की मेरी संगीत में रूचि ही मुकेश जी की वजह से प्रारम्भ हुई | एक बार बचपन में उनका गीत रेडियो पर सुना-"जाने चले जाते हैं कहाँ" और अगले ही पल जब उद्घोषक ने ये कहा कि मुकेश जी की पुण्यतिथि पर यह गीत प्रसारित हो रहा है तो मेरे बदन में सिहरन-सी दौड़ गयी थी | तभी मैंने महसूस किया कि वह व्यक्ति जो अब ज़िंदा नहीं है, अपनी आवाज़ के रूप में कितना हमारे करीब है | सच पूछिए तो तभी से संगीत मुझे लुभाने लगा था | अपने पिताजी के डर से और माँ के सहयोग से मैंने चोरी-छिपे बनारस के बुलानाला में स्थित "गुप्ता-संगीतालय" से हारमोनियम और गिटार सीखा | फिर दो साल संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय में प० जमुना प्रसाद मिश्र जी से तबला तथा प० जालपा प्रासाद मिश्र जी से गायन सीखा | एल-एल-बी० करने  के कारण गायन अधूरा रहा पर बाद में मैंने संगीत में अपना सीखना जारी रखा, हालांकि यह क्रमबद्ध नहीं हो पाया | संगीत से दूर रहना मुश्किल था, शायद इसीलिये बाद में संगीत की और दो उपाधियाँ मैंने ली |
       मुकेश जी के प्रभाव से संगीत से जुड़ा, इसलिए मैं उनके गीत खूब गाता और गुनगुनाता रहता था | उन दिनों मैं अक्सर मुंशी-घाट पर गर्मियों में नहाने जाया करता था, जहाँ देर तक मैं गंगा जी में नहाता और मुकेश के गीत गाता रहता था | उनके गीतों की और कई खूबसूरत यादें मेरे साथ जुड़ी हुई हैं जिन्हें मैं बाद में आपसे जरूर बताना चाहूँगा |